भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

इन्द्र और अग्निद्वारा राजा शिबिकी परीक्षा

मार्कण्डेय उवाच

देवानां कथा संजाता महीतलं गत्वा महीपतिं शिबिमुशीनरं साध्वेनं शिबिं जिज्ञास्याम इति। एवं भो इत्युक्त्वा अग्नीन्द्रावुपतिष्ठेताम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! एक समय देवताओंमें परस्पर यह बातचीत हुई कि ‘पृथ्वीपर चलकर हम उशीनरके पुत्र राजा शिबिकी श्रेष्ठताकी परीक्षा करें।’ ‘ऐसा ही हो’ यह कहकर अग्नि और इन्द्र वहाँ जानेके लिये उद्यत हुए ॥ १ ॥

अग्निः कपोतरूपेण तमभ्यधावदामिषार्थमिन्द्रः श्येनरूपेण ॥ २ ॥
अग्निदेव कबूतरका रूप धारण करके मानो अपने प्राण बचानेके लिये राजाके पास भागते हुए गये और इन्द्रने बाज पक्षीका रूप धारण कर मांसके लिये उस कबूतरका पीछा किया ॥ २ ॥

अथ कपोतो राज्ञो दिव्यासनासीनस्योत्सङ्गं न्यपतत् ॥ ३ ॥
राजा शिबि अपने दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए थे। कबूतर उनकी गोदमें जा गिरा ॥ ३ ॥

अथ पुरोहितो राजानमब्रवीत् । प्राणरक्षार्थं श्येनाद् भीतो भवन्तं प्राणार्थी प्रपद्यते ॥ ४ ॥
यह देखकर पुरोहितने राजासे कहा—‘महाराज! यह कबूतर बाजके डरसे अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये आपकी शरणमें आया है। किसी तरह प्राण बच जायँ—यही इसका प्रयोजन है ॥ ४ ॥

वसु ददातु अन्तवान् पार्थिवोऽस्य निष्कृतिं कुर्याद् घोरं कपोतस्य निपातमाहुः ॥ ५ ॥
‘परंतु विद्वान् पुरुष कहते हैं कि ‘इस तरह कबूतरका आकर गिरना भयंकर अनिष्टका सूचक है।’ आपकी मृत्यु निकट जान पड़ती है; अतः आपको इस उत्पातकी शान्ति करनी चाहिये। आप धन दान करें’ ॥ ५ ॥