महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूख बुझानेके लिये उसके हवाले कर देना उत्तम दान नहीं है। अतः आप मुझे बाजको न सौंपिये। मैं कबूतर नहीं हूँ' ॥ ८ ॥
अथ श्येनो राजनम्ब्रवीत् ॥ ९ ॥ पर्यायेण वसतिर्वा भवेषु सर्गे ज्ञातः पूर्वमस्मात् कपोतात् । त्वमाददानोऽथ कपोतमेनं मा त्वं राजन् विघ्नकर्ता भवेथाः ॥ १० ॥
तदनन्तर बाजने राजासे कहा—‘महाराज! प्रायः सभी जीवोंको बारी-बारीसे विभिन्न योनियोंमें जन्म लेकर रहना पड़ता है। मालूम होता है, आप इस सृष्टि-परम्परामें पहले कभी इस कबूतरसे जन्म ग्रहण कर चुके हैं; तभी तो इसे अपने आश्रयमें ले रहे हैं! राजन्! मैं आग्रहपूर्वक कहता हूँ, आप इस कबूतरको लेकर मेरे भोजनके कार्यमें विघ्न न डालें' ॥ ९-१० ॥
राजोवाच
केनेदृशी जातु परा हि दृष्टा वागुच्यमाना शकुनेन संस्कृता । यां वै कपोतो वदते यां च श्येन उभौ विदित्वा कथमस्तु साधु ॥ ११ ॥
राजा बोले—अहो! आजसे पहले किसने कभी भी किसी पक्षीके मुखसे ऐसी उत्तम संस्कृत भाषाका उच्चारण देखा या सुना है, जैसी कि ये कबूतर और बाज बोल रहे हैं? किस प्रकार इन दोनोंका स्वरूप जानकर इनके प्रति न्यायोचित बर्ताव किया जा सकता है? ॥ ११ ॥
नास्य वर्षं वर्षति वर्षकाले नास्य बीजं रोहति काल उप्तम् । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे न त्राणं लभेत् त्राणमिच्छन् स काले ॥ १२ ॥
जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसके देशमें समयपर वर्षा नहीं होती। उसके बोये हुए बीज भी समयपर नहीं उगते हैं। वह कभी संकटके समय जब अपनी रक्षा चाहता है, तब उसे कोई रक्षक नहीं मिलता ॥ १२ ॥
जाता ह्रस्वा प्रजा प्रमीयते सदा न वासं पितरोऽस्य कुर्वते । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे नास्य देवाः प्रतिगृह्णन्ति हव्यम् ॥ १३ ॥