भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1436, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1436

आपका भला हो, आज्ञा दीजिये, मैं क्या सेवा करूँ? ।। १३ ।।

एकपत्न्या यदुक्तोऽसि गच्छ त्वं मिथिलामिति । जानाम्येतदहं सर्वं यदर्थं त्वमिहागतः ।। १४ ।। उस पतिव्रता देवीने जो आपसे यह कहकर भेजा है कि 'तुम मिथिलापुरीको जाओ।' वह सब मैं जानता हूँ। आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह भी मुझे मालूम है ।। १४ ।। श्रुत्वा च तस्य तद् वाक्यं स विप्रो भृशविस्मितः । द्वितीयमिदमाश्चर्यमित्यचिन्तयत द्विजः ।। १५ ।। व्याधकी वह बात सुनकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ। वह मन-ही-मन सोचने लगा—'यह दूसरा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ है' ।। १५ ।। अदेशस्थं हि ते स्थानमिति व्याधोऽब्रवीदिदम् । गृहं गच्छाव भगवन् यदि ते रोचतेऽनघ ।। १६ ।। इसके बाद व्याधने कहा—'भगवन्! यह स्थान आपके ठहरनेयोग्य नहीं है। अनघ! यदि आपकी रुचि हो तो हम दोनों हमारे घरपर चलें' ।। १६ ।। मार्कण्डेय उवाच बाढमित्येव तं विप्रो हृष्टो वचनमब्रवीत् । अग्रतस्तु द्विजं कृत्वा स जगाम गृहं प्रति ।। १७ ।।

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