महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1473, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन
मार्कण्डेय उवाच
एवं तु सूक्ष्मे कथिते धर्मव्याधेन भारत ।
ब्राह्मणः स पुनः सूक्ष्मं पप्रच्छ सुसमाहितः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भारत! इस प्रकार धर्मव्याधके द्वारा सूक्ष्म तत्त्वका निरूपण होनेपर कौशिक ब्राह्मणने एकाग्रचित्त होकर पुनः एक सूक्ष्म प्रश्न उपस्थित किया ॥ १ ॥
ब्राह्मण उवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम् ।
गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छतः ॥ २ ॥
ब्राह्मण बोला— व्याध! मैं यहाँ यथोचितरूपसे एक प्रश्न उपस्थित करता हूँ। वह यह है कि सत्त्व, रज और तमका गुण (स्वरूप) क्या है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताओ ॥ २ ॥
व्याध उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
एषां गुणान् पृथक्त्वेन निबोध गदतो मम ॥ ३ ॥
धर्मव्याधने कहा— ब्रह्मन्! आप मुझसे जो बात पूछ रहे हैं, मैं अब उसे कहूँगा। सत्त्व, रज और तम—इन तीनोंके गुणोंका पृथक्-पृथक् वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥ ३ ॥
मोहात्मकं तमस्तेषां रज एषां प्रवर्तकम् ।
प्रकाशबहुत्वाच्च सत्त्वं ज्याय इहोच्यते ॥ ४ ॥
इन तीनों गुणोंमें जो तमोगुण है वह मोहात्मक—मोह उत्पन्न करनेवाला है। रजोगुण कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला है। परंतु सत्त्वगुणमें प्रकाशकी बहुलता है, इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ ४ ॥
अविद्याबहुलो मूढः स्वप्नशीलो विचेतनः ।
दुर्हृषीकस्तमोध्वस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ॥ ५ ॥
जिसमें अज्ञानकी बहुलता है, जो मूढ़ (मोहग्रस्त) और अचेत होकर सदा नींद लेता रहता है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें न होनेके कारण दूषित हैं, जो अविवेकी, क्रोधी और आलसी है, ऐसे मनुष्यको तमोगुणी जानना चाहिये ॥ ५ ॥
प्रवृत्तवाक्यो मन्त्री च यो नराग्र्योऽनसूयकः ।
विधित्समानो विप्रर्षे स्तब्धो मानी स राजसः ॥ ६ ॥