महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1524, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुनःउनका प्राकट्य
मार्कण्डेय उवाच
आपस्य मुदिता भार्या सहस्य परमा प्रिया ।
भूपतिर्भुवभर्ता च जनयत् पावकं परम् ।। १ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! जलमें निवासके कारण प्रसिद्ध हुए 'सह' नामक अग्निके एक परम प्रिय पत्नी थी जिसका नाम था मुदिता। उसके गर्भसे भूलोक और भुवर्लोकके स्वामी सहने 'अद्भुत'* नामक उत्कृष्ट अग्निको उत्पन्न किया ।। १ ।।
भूतानां चापि सर्वेषां यं प्राहुः पावकं पतिम् ।
आत्मा भुवनभर्तेति सान्वयेषु द्विजातिषु ।। २ ।।
ब्राह्मणलोगोंमें वंशपरम्पराके क्रमसे सभी यह मानते और कहते हैं कि 'अद्भुत' नामक अग्नि सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं। वे ही सबके आत्मा और भुवनभर्ता हैं ।। २ ।।
महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पतिः ।
भगवान् स महातेजा नित्यं चरति पावकः ।। ३ ।।
‘वे ही इस जगत्के सम्पूर्ण महाभूतोंके पति हैं। उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य सुशोभित हैं। वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं ।। ३ ।।
अग्निर्गृहपतिर्नाम नित्यं यज्ञेषु पूज्यते ।
हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावकः ।। ४ ।।
‘जो अग्नि गृहपति नामसे सदा यज्ञमें पूजित होते हैं तथा हवन किये गये हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं, वे अद्भुत अग्नि ही इस जगत्को पवित्र करनेवाले हैं ।। ४ ।।
अपां गर्भो महाभागः सत्त्वभुग् यो महाद्भुतः ।
भूपतिर्भुवभर्ता च महतः पतिरुच्यते ।। ५ ।।
‘जो ‘आप’ नामवाले सहके पुत्र हैं, जो महाभाग, सत्त्वभोक्ता, भूलोकके पालक और भुवर्लोकके स्वामी हैं, वे अद्भुत नामक महान् अग्नि बुद्धितत्त्वके अधिपति बताये जाते हैं’ ।। ५ ।।
दहन् मृतानि भूतानि तस्याग्निर्भरतोऽभवत् ।
अग्निष्टोमे च नियतः क्रतुश्रेष्ठो भरस्य तु ।। ६ ।।
‘उन्हीं ‘अद्भुत’ या गृहपतिके एक अग्निस্বরূপ पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘भरत’ है। ये मरे हुए प्राणियोंके शवका दाह करते हैं। भरतका अग्निष्टोम यज्ञमें नित्य निवास है,