महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1578, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्कन्द बोले—देवि! आजसे सन्मार्गपर चलने-वाले सदाचारी धर्मात्मा मनुष्य देवताओं तथा पितरोंके लिये हव्य और कव्यके रूपमें उठाकर ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंके साथ अग्निमें जो कुछ आहुति देंगे, वह सब स्वाहाका नाम लेकर ही अर्पण करेंगे। शोभने! इस प्रकार तुम्हारे साथ निरन्तर अग्निदेवका निवास बना रहेगा ॥ ५-६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्ता ततः स्वाहा तुष्टा स्कन्देन पूजिता । पावकेन समायुक्ता भर्त्रा स्कन्दमपूजयत् ॥ ७ ॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! स्कन्दके इस प्रकार कहने और आदर देनेपर स्वाहा बहुत संतुष्ट हुई। अपने स्वामी अग्निदेवका संयोग पाकर उसने भी स्कन्दका पूजन किया ॥ ७ ॥
ततो ब्रह्मा महासेनं प्रजापतिरथाब्रवीत् । अभिगच्छ महादेवं पितरं त्रिपुरार्दनम् ॥ ८ ॥ तदनन्तर प्रजापति ब्रह्माजीने महासेनसे कहा—'वत्स! अब तुम अपने पिता त्रिपुरविनाशक महादेवजीसे मिलो ॥
रुद्रेणाग्निं समाविश्य स्वाहामाविश्य चोमया । हितार्थं सर्वलोकानां जातस्त्वमपराजितः ॥ ९ ॥ 'भगवान् रुद्रने अग्निमें और भगवती उमाने स्वाहामें प्रवेश करके समस्त लोकोंके हितके लिये तुम-जैसे अपराजित वीरको उत्पन्न किया है ॥ ९ ॥
उमायोन्यां च रुद्रेण शुक्रं सिक्तं महात्मना । अस्मिन् गिरौ निपतितं मिज्जिकामिज्जिकं यतः ॥ १० ॥ सम्भूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत् । सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद् भुवि ॥ ११ ॥ आसक्तमन्यद् वृक्षेषु तदेवं पञ्चधापतत् । तत्र ते विविधाकारा गणा ज्ञेया मनीषिभिः । तव परिषदा घोरा य एते पिशिताशिनः ॥ १२ ॥ 'महात्मा रुद्रने उमाके गर्भमें जिस वीर्यकी स्थापना की थी, उसका कुछ भाग इसी पर्वतपर गिर पड़ा था, जिससे मिंजिका-मिंजिक नामक जोड़ेकी उत्पत्ति हुई। शेष शुक्रका कुछ अंश लोहित-सागरमें, कुछ सूर्यकी किरणोंमें, कुछ पृथ्वीपर और कुछ वृक्षोंपर गिर पड़ा। इस प्रकार वह पाँच भागोंमें विभक्त होकर गिरा था। उसीसे ये तुम्हारे विभिन्न आकृतिवाले, मांसभक्षी एवं भयंकर पार्षद प्रकट हुए हैं; जिन्हें मनीषी पुरुष ही जान पाते हैं' ॥ १०—१२ ॥
एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा महासेनो महेश्वरम् ।