भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1582

मालाधारी जृम्भकगण, यक्ष तथा राक्षसोंसे सुशोभित महायक्ष अमोघ भगवान् शंकरके दाहिने भागमें रहकर चल रहा था ।। ३४ १/२ ।।

तस्य दक्षिणतो देवा बहवश्चित्रयोधिनः ।। ३५ ।।
गच्छन्ति वसुभिः सार्धं रुद्रैश्च सह सङ्गताः ।
उसके दाहिने भागमें विचित्र प्रकारके युद्ध करनेवाले बहुत-से देवता वसुओं तथा रुद्रोंके साथ संगठित होकर चल रहे थे ।। ३५ १/२ ।।

यमश्च मृत्युना सार्धं सर्वतः परिवारितः ।। ३६ ।।
घोरैर्व्याधिशतैर्याति घोररूपवपुस्तथा ।
मृत्युसहित यमराज अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके देवताओंके साथ यात्रा कर रहे थे। उन्हें सैकड़ों भयानक रोगोंने मूर्तिमान् होकर चारों ओरसे घेर रखा था ।। ३६ १/२ ।।

यमस्य पृष्ठतश्चैव घोरस्त्रिशिखरः शितः ।। ३७ ।।
विजयो नाम रुद्रस्य याति शूलः स्वलङ्कृतः ।
यमराजके पीछे-पीछे भगवान् शंकरका विजय नामक भयंकर त्रिशूल जा रहा था, जो तीन शिखरोंसे सुशोभित और तीक्ष्ण था। उस त्रिशूलको सिन्दूर आदिसे भलीभाँति सजाया गया था ।। ३७ १/२ ।।

तमग्रपाशो वरुणो भगवान् सलिलेश्वरः ।। ३८ ।।
परिवार्य शनैर्याति यादोभिर्विविधैर्वृतः ।
जलके स्वामी भगवान् वरुण हाथमें भयंकर पाश लिये उस त्रिशूलको सब ओरसे घेरकर धीरे-धीरे चल रहे थे। उनके साथ नाना प्रकारकी आकृतिवाले जलजन्तु भी थे ।। ३८ १/२ ।।

पृष्ठतो विजयस्यापि याति रुद्रस्य पट्टिशः ।। ३९ ।।
गदामुसलशक्त्याद्यैर्वृतः प्रहरणोत्तमैः ।
विजयके पीछे भगवान् रुद्रका पट्टिश नामक शस्त्र जा रहा था, जिसे गदा, मुसल और शक्ति आदि उत्तम आयुधोंने घेर रक्खा था ।। ३९ १/२ ।।

पट्टिशं त्वन्वगाद् राजञ्छत्रं रौद्रं महाप्रभम् ।। ४० ।।
कमण्डलुश्चाप्यनु तं महर्षिगणसेवितः ।
राजन्! पट्टिशके पीछे भगवान् रुद्रका अत्यन्त प्रभावपूर्ण छत्र जा रहा था और उसके पीछे महर्षियोंद्वारा सेवित कमण्डलु यात्रा कर रहा था ।। ४० १/२ ।।

तस्य दक्षिणतो भाति दण्डो गच्छन् श्रिया वृतः ।। ४१ ।।
भृग्वङ्गिरोभिः सहितो दैवतैश्चानुपूजितः ।