भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1676, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1676

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सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः सेनासहित दुर्योधनका मार्गमें ठहरना और कर्णके द्वारा उसका अभिनन्दन

जनमेजय उवाच

शत्रुभिर्जितबद्धस्य पाण्डवैश्च महात्मभिः । मोक्षितस्य युधा पश्चान्मानिनः सुदुरात्मनः ॥ १ ॥ कत्थनस्यावलिप्तस्य गर्वितस्य च नित्यशः । सदा च पौरुषौदार्यैः पाण्डवानवमन्यतः ॥ २ ॥ दुर्योधनस्य पापस्य नित्याहंकारवादिनः । प्रवेशो हास्तिनपुरे दुष्करः प्रतिभाति मे ॥ ३ ॥ तस्य लज्जान्वितस्यैव शोकव्याकुलचेतसः । प्रवेशं विस्तरेण त्वं वैशम्पायन कीर्तय ॥ ४ ॥ **जनमेजय बोले—**मुने! दुर्योधनको शत्रुओंने जीता और बाँध लिया। फिर महात्मा पाण्डवोंने गन्धर्वोंके साथ युद्ध करके उसे छुड़ाया। ऐसी दशामें उस अभिमानी और दुरात्मा दुर्योधनका हस्तिनापुरमें प्रवेश करना मुझे तो अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है; क्योंकि वह अपने शौर्यके विषयमें बहुत डींग हाँका करता था, घमंडमें भरा रहता था और सदा गर्वके नशेमें चूर रहा करता था। उसने अपने पौरुष और उदारताद्वारा सदा पाण्डवोंका अपमान ही किया था। पापी दुर्योधन सदा अहंकारकी ही बातें करता था। पाण्डवोंकी सहायतासे मेरे जीवनकी रक्षा हुई, यह सोचकर तो वह लज्जित हो गया होगा; उसका हृदय शोकसे व्याकुल हो उठा होगा। वैशम्पायनजी! ऐसी स्थितिमें उसने अपनी राजधानीमें कैसे प्रवेश किया? यह विस्तारपूर्वक कहिये ।।

वैशम्पायन उवाच

धर्मराजनिसृष्टस्तु धार्तराष्ट्रः सुयोधनः । लज्जयाधोमुखः सीदन्नुपासर्पत् सुदुःखितः ॥ ५ ॥ **वैशम्पायनजी बोले—**राजन्! धर्मराजसे विदा होकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन लज्जासे मुँह नीचा किये अत्यन्त दुःखी और खिन्न होकर वहाँसे चल दिया ।। ५ ।। स्वपुरं प्रययौ राजा चतुरंगबलानुगः । शोकोपहतया बुद्ध्या चिन्तयानः पराभवम् ॥ ६ ॥ राजा दुर्योधनकी बुद्धि शोकसे मारी गयी थी। वह अपने अपमानपर विचार करता हुआ चतुरंगिणी सेनाके साथ नगरकी ओर चल पड़ा ।। ६ ।।