महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1691, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना
वैशम्पायन उवाच
प्रायोपविष्टं राजानं दुर्योधनममर्षणम् ।
उवाच सान्त्वयन् राजञ्छकुनिः सौबलस्तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर अमर्षमें भरकर आमरण उपवासके लिये बैठे हुए राजा दुर्योधनको सान्त्वना देते हुए सुबलपुत्र शकुनिने कहा ॥ १ ॥
शकुनिरुवाच
सम्यगुक्तं हि कर्णेन तच्छ्रुतं कौरव त्वया ।
मया हृतां श्रियं स्फीतां तां मोहादपहाय किम् ॥ २ ॥
शकुनि बोला— कुरुनन्दन! कर्णने बहुत अच्छी बात कही है, जो तुमने सुनी ही है। मैंने पाण्डवोंसे तुम्हारे लिये जिस समृद्धशालिनी राज-लक्ष्मीका अपहरण किया है, तुम उसे मोहवश क्यों त्याग रहे हो? ॥ २ ॥
त्वमल्पबुद्ध्या नृपते प्राणानुत्स्रष्टुमर्हसि ।
अथवाप्यवगच्छामि न वृद्धाः सेवितास्त्वया ॥ ३ ॥
नरेश्वर! तुम अपनी अल्पबुद्धिके कारण ही आज प्राणत्याग करनेको उतारू हो गये हो; अथवा मैं समझता हूँ कि तुमने कभी वृद्धपुरुषोंका सेवन नहीं किया है ॥ ३ ॥
यः समुत्पतितं हर्षं दैन्यं वा न नियच्छति ।
स नश्यति श्रियं प्राप्य पात्रमाममिवाम्भसि ॥ ४ ॥
जो मनुष्य सहसा उत्पन्न हुए हर्ष अथवा शोकपर नियन्त्रण नहीं रखता, वह राजलक्ष्मीको पाकर भी उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे मिट्टीका कच्चा बर्तन पानीमें गल जाता है ॥ ४ ॥
अतिभीरुमतिक्लीबं दीर्घसूत्रं प्रमादिनम् ।
व्यसनाद् विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजाः ॥ ५ ॥
जो राजा अत्यन्त डरपोक, बहुत कायर, दीर्घसूत्री (आलसी), प्रमादी और दुर्व्यसनवश विषयोंमें फँसा होता है, उसे प्रजा अपना स्वामी नहीं स्वीकार करती है ॥ ५ ॥
सत्कृतस्य हि ते शोको विपरीते कथं भवेत् ।
मा कृतं शोभनं पार्थैः शोकमलम्ब्य नाशय ॥ ६ ॥