भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1734

‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो, संसारमें जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे महान् सुखकी उपलब्धि नहीं कर पाते हैं। मनुष्य बारी-बारीसे सुख और दुःख दोनोंका सेवन करता है।। १२-१३।।

न ह्यनन्तं सुखं कश्चित् प्राप्नोति पुरुषर्षभ। प्रज्ञावांस्त्वेव पुरुषः संयुक्तः परया धिया।। १४।। उदयास्तमनज्ञो हि न हृष्यति न शोचति। ‘नरश्रेष्ठ! कोई भी इस जगत्में ऐसा सुख नहीं पाता, जिसका कभी अन्त न हो। उत्तम बुद्धिसे युक्त ज्ञानवान् पुरुष ही उत्पत्ति, स्थिति और लयके अधिष्ठानरूप परमात्माको जानकर कभी हर्ष और शोक नहीं करता है।। १४ १/२।। सुखमापतितं सेवेद् दुःखमापतितं वहेत्।। १५।। कालप्राप्तमुपासीत सस्यानामिव कर्षकः। ‘अतः विवेकी पुरुषको उचित है कि प्राप्त हुए सुखका (त्यागपूर्वक) सेवन करे और स्वतः आये हुए दुःखका भार भी (धैर्यपूर्वक) वहन करे। जैसे किसान बीज बोकर समयके अनुसार प्रारब्धवश जितना अन्न मिलता है, उसे ग्रहण करता है; उसी प्रकार मनुष्य समय-समयपर दैववश प्राप्त हुए सुख तथा दुःखको स्वीकार करें।। १५ १/२।। तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत्।। १६।।