भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1741, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1741

निराहारस्तु स मुनिरुञ्छमार्जायते पुनः । न चैनं विक्रियां नेतुमशकन्मुद्गलं क्षुधा ॥ १९ ॥ मुनि निराहार रहकर पुनः अन्नके दाने बीनने लगे। भूखका कष्ट उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेमें समर्थ न हो सका ॥ १९ ॥

न क्रोधो न च मात्सर्यं नावमानो न सम्भ्रमः । सपुत्रदारमुञ्छन्तमाविवेश द्विजोत्तमम् ॥ २० ॥ स्त्री-पुत्रसहित अन्नके दाने चुनते हुए विप्रवर मुद्गलके हृदयमें क्रोध, द्वेष, घबराहट तथा अपमान प्रवेश नहीं कर सके ॥ २० ॥

तथा तमुञ्छधर्माणं दुर्वासा मुनिसत्तमम् । उपतस्थे यथाकालं षट्कृत्वः कृतनिश्चयः ॥ २१ ॥ इस प्रकार उञ्छधर्मका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ मुद्गलके घरपर महर्षि दुर्वासा उनका धैर्य छुड़ानेका दृढ़ निश्चय लेकर लगातार छः बार ठीक पर्वके समय उपस्थित हुए ॥ २१ ॥

न चास्य मनसा कंचिद् विकारं ददृशे मुनिः । शुद्धसत्त्वस्य शुद्धं स ददृशे निर्मलं मनः ॥ २२ ॥

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 1741, कुल 2580 में से · BharatKosha