भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1742

किंतु उन्होंने उनके मनमें कभी कोई विकार नहीं देखा। शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि मुद्गलके मनको दुर्वासाने सदा शुद्ध और निर्मल ही पाया॥ २२॥ तमुवाच ततः प्रीतः स मुनिर्मुद्गलं ततः। त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन् दाता मात्सर्यवर्जितः॥ २३॥ तब वे प्रसन्न होकर मुद्गलसे बोले—'ब्रह्मन्! इस संसारमें ईर्ष्यासे रहित होकर दान देनेवाला मनुष्य तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है॥ २३॥ क्षुद् धर्मसंज्ञां प्रणुदत्यादत्ते धैर्यमेव च। रसानुसारिणी जिह्वा कर्षत्येव रसान् प्रति ॥ २४ ॥ 'भूख (बड़े-बड़े लोगोंके) धर्मज्ञानको विलुप्त कर देती है, धैर्य हर लेती है तथा रसका अनुसरण करनेवाली रसना सदा रसीले पदार्थोंकी ओर मनुष्यको खींचती रहती है॥ २४॥ आहारप्रभवाः प्राणा मनो दुर्निग्रहं चलम्। मनसश्चेन्द्रियाणां चाप्यैकाग्र्यं निश्चितं तपः॥ २५॥ 'भोजनसे ही प्राणोंकी रक्षा होती है। चंचल मनको रोकना अत्यन्त कठिन होता है। मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रताको ही निश्चितरूपसे तप कहा गया है'॥ २५॥ श्रमेणोपार्जितं त्यक्तुं दुःखं शुद्धेन चेतसा। तत् सर्वं भवता साधो यथावदुपपादितम्॥ २६॥ 'परिश्रमसे उपार्जित किये हुए धनका शुद्ध हृदयसे दान करना अत्यन्त दुष्कर है। परंतु श्रेष्ठ पुरुष! तुमने यह सब कुछ यथार्थरूपसे सिद्ध कर लिया है॥ २६॥ प्रीताः स्मोऽनुगृहीताश्च समेत्य भवता सह। इन्द्रियाभिजयो धैर्यं संविभागो दमः शमः॥ २७॥ दया सत्यं च धर्मश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्। (विशुद्धसत्त्वसम्पन्नो न त्वदन्योऽस्ति कश्चन।) जितास्ते कर्मभिर्लोकाः प्राप्तोऽसि परमां गतिम्॥ २८॥ 'तुमसे मिलकर हम बहुत प्रसन्न हैं और अपने ऊपर तुम्हारा अनुग्रह मानते हैं। इन्द्रियसंयम, धैर्य, संविभाग (दान), शम, दम, दया, सत्य और धर्म—ये सब गुण तुममें पूर्णरूपसे विद्यमान हैं। तुम्हारे-जैसा पवित्र अन्तःकरणवाला दूसरा कोई नहीं है। तुमने अपने शुभ कर्मोंसे सभी लोकोंको जीत लिया; परमपदको प्राप्त कर लिया॥ २७-२८॥ अहो दानं विघुष्टं ते सुमहत् स्वर्गवासिभिः। सशरीरो भवान् गन्ता स्वर्गं सुचरितव्रत॥ २९॥ 'अहो! स्वर्गवासी देवताओंने भी तुम्हारे महान् दानकी सर्वत्र घोषणा की है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! तुम सदेह स्वर्गलोकको जाओगे'॥ २९॥ इत्येवं वदतस्तस्य तदा दुर्वाससो मुनेः।