महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1743, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवदूतो विमानेन मुद्गलं प्रत्युपस्थितः ॥ ३० ॥ दुर्वासा मुनि इस प्रकार कह ही रहे थे कि एक देवदूत विमानके साथ मुद्गल ऋषिके पास आ पहुँचा ॥
हंससारसयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना । कामगेन विचित्रेण दिव्यगन्धवता तथा ॥ ३१ ॥ उस विमानमें हंस एवं सारस जुते हुए थे। क्षुद्र-घण्टिकाओंकी जालीसे उसे सुसज्जित किया गया था तथा उससे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी। वह विमान देखनेमें बड़ा विचित्र और इच्छानुसार चलनेवाला था ॥ ३१ ॥
उवाच चैनं विप्रर्षिं विमानं कर्मभिर्जितम् । समुपारोह संसिद्धिं प्राप्तोऽसि परमां मुने ॥ ३२ ॥ देवदूतने ब्रह्मर्षि मुद्गलसे कहा—‘मुने! यह विमान आपको शुभ कर्मोंसे प्राप्त हुआ है। इसपर बैठिये। आप परम सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं’ ॥ ३२ ॥
तमेवंवादिनमृषिर्देवदूतमुवाच ह । इच्छामि भवता प्रोक्तान् गुणान् स्वर्गनिवासिनाम् ॥ ३३ ॥ के गुणास्तत्र वसतां किं तपः कश्च निश्चयः । स्वर्गे तत्र सुखं किं च दोषो वा देवदूतक ॥ ३४ ॥