महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1834, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्माजी बोले— पुत्रो! मैं तुम सबपर प्रसन्न हूँ, वर माँगो और तपस्यासे निवृत्त हो जाओ। केवल अमरत्वको छोड़कर जिसकी जो-जो इच्छा हो, उसके अनुसार वह वर माँगे। उसका वह मनोरथ पूर्ण होगा ।। यद् यदग्नौ हुतं सर्वं शिरस्ते महदीप्सया । तथैव तानि ते देहे भविष्यन्ति यथेप्सया ॥ २३ ॥ (तत्पश्चात् उन्होंने रावणकी ओर लक्ष्य करके कहा—) तुमने महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने जिन-जिन मस्तकोंकी अग्निमें आहुति दी है, वे सब-के-सब पूर्ववत् तुम्हारे शरीरमें इच्छानुसार जुड़ जायँगे ।। वैरूप्यं च न ते देहे कामरूपधरस्तथा । भविष्यसि रणेऽरीणां विजेता न च संशयः ॥ २४ ॥ तुम्हारे शरीरमें किसी प्रकारकी कुरूपता नहीं होगी, तुम इच्छानुसार रूप धारण कर सकोगे तथा युद्धमें शत्रुओंपर विजयी होओगे, इसमें संशय नहीं है ।। २४ ।।
रावण उवाच
गन्धर्वदेवासुरतो यक्षराक्षसतस्तथा । सर्पकिन्नरभूतेभ्यो न मे भूयात् पराभवः ॥ २५ ॥ रावण बोला— भगवन्! गन्धर्व, देवता, असुर, यक्ष, राक्षस, सर्प, किन्नर तथा भूतोंसे कभी मेरी पराजय न हो ।। २५ ।।
ब्रह्मोवाच
य एते कीर्तिताः सर्वे न तेभ्योऽस्ति भयं तव । ऋते मनुष्याद् भद्रं ते तथा तद् विहितं मया ॥ २६ ॥ ब्रह्माजीने कहा— तुमने जिन लोगोंका नाम लिया है, इनमेंसे किसीसे भी तुम्हें भय नहीं होगा। केवल मनुष्यको छोड़कर तुम सबसे निर्भय रहो। तुम्हारा भला हो। तुम्हारे लिये मनुष्यसे होनेवाले भयका विधान मैंने ही किया है ।। २६ ।।
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्तो दशग्रीवस्तुष्टः समभवत् तदा । अवमेने हि दुर्बुद्धिर्मनुष्यान् पुरुषादकः ॥ २७ ॥