भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1835

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दसमुख रावण बहुत प्रसन्न हुआ। वह दुर्बुद्धि नरभक्षी राक्षस मनुष्योंकी अवहेलना करता था ।। २७ ।।

कुम्भकर्णमथोवाच तथैव प्रपितामहः । स वव्रे महतीं निद्रां तमसा ग्रस्तचेतनः ।। २८ ।।

तत्पश्चात् ब्रह्माजीने कुम्भकर्णसे वर माँगनेको कहा। परंतु उसकी बुद्धि तमोगुणसे ग्रस्त थी; अतः उसने अधिक कालतक नींद लेनेका वर माँगा ।। २८ ।।

तथा भविष्यतीत्युक्त्वा विभीषणमुवाच ह । वरं वृणीष्व पुत्र त्वं प्रीतोऽस्मीति पुनः पुनः ।। २९ ।।

उसे 'ऐसा ही होगा' यों कहकर ब्रह्माजी विभीषणके पास गये और इस प्रकार बोले—'बेटा! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, अतः तुम भी वर माँगो।' ब्रह्माजीने यह बात बार-बार दुहरायी ।। २९ ।।

विभीषण उवाच

परमापद्गतस्यापि नाधर्मे मे मतिर्भवेत् । अशिक्षितं च भगवन् ब्रह्मास्त्रं प्रतिभातु मे ।। ३० ।।