भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1836, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1836

विभीषण बोले—भगवन्! बहुत बड़ा संकट आनेपर भी मेरे मनमें कभी पापका विचार न उठे तथा बिना सीखे ही मेरे हृदयमें ब्रह्मास्त्रके प्रयोग और उपसंहारकी विधि स्फुरित हो जाय ।। ३० ।।

ब्रह्मोवाच
यस्माद् राक्षसयोनौ ते जातस्यामित्रकर्शन ।
नाधर्मे धीयते बुद्धिरमरत्वं ददानि ते ।। ३१ ।।
ब्रह्माजीने कहा—शत्रुनाशन! राक्षसयोनिमें जन्म लेकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्ममें नहीं लगती; इसलिये (तुम्हारे माँगे हुए वरके अतिरिक्त) मैं तुम्हें अमरत्व भी देता हूँ ।। ३१ ।।

मार्कण्डेय उवाच
राक्षसस्तु वरं लब्ध्वा दशग्रीवो विशाम्पते ।
लङ्कायाश्च्यावयामास युधि जित्वा धनेश्वरम् ।। ३२ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! राक्षस दशाननने वर प्राप्त कर लेनेपर सबसे पहले अपने भाई कुबेरको युद्धमें परास्त किया और उन्हें लंकाके राज्यसे बहिष्कृत कर दिया ।। ३२ ।।
हित्वा स भगवाँल्लङ्कामाविशद् गन्धमादनम् ।
गन्धर्वयक्षानुगतो रक्ष:किम्पुरुषैः सह ।। ३३ ।।
भगवान् कुबेर लंका छोड़कर गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा किम्पुरुषोंके साथ गन्धमादन पर्वतपर आकर रहने लगे ।।
विमानं पुष्पकं तस्य जहाराक्रम्य रावणः ।
शशाप तं वैश्रवणो न त्वामेतद् वहिष्यति ।। ३४ ।।
यस्तु त्वां समरे हन्ता तमेवैतद् वहिष्यति ।
अवमन्य गुरुं मां च क्षिप्रं त्वं न भविष्यसि ।। ३५ ।।