भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1914

ऋक्षाणां धूम्रवर्णानां तिस्रः कोट्यो व्यवस्थिताः ।। २६ ।।

उनके भुजा, ऊरु, हाथ और जंघा (पिंडली) – ये सभी अङ्ग विशाल थे तथा अंगोंकी

कान्ति धुएँके समान काली थी, ऐसे तीन करोड़ रीछ सैनिक भी उनके साथ लंकामें जाकर

युद्धके लिये डटे हुए थे ।।

उत्पतद्भिः पतद्भिश्च निपतद्भिश्च वानरैः ।

नादृश्यत तदा सूर्यो रजसा नाशितप्रभः ।। २७ ।।

उस समय वानरोंके उछलने-कूदने तथा गिरने-पड़नेसे इतनी धूल उड़ी कि उससे

सूर्यकी प्रभा नष्ट-सी हो गयी और उसका दीखना बंद हो गया ।। २७ ।।

शालिप्रसूनसदृशैः शिरीषकुसुमप्रभैः ।

तरुणादित्यसदृशैः शणगौरैश्च वानरैः ।। २८ ।।

प्राकारं ददृशुस्ते तु समन्तात् कपिलीकृतम् ।

राक्षसा विस्मिता राजन् सस्त्रीवृद्धाः समन्ततः ।। २९ ।।

राजन्! धानके फूल-जैसे रंगवाले, मौलसिरीके पुष्प-सदृश कान्तिवाले, प्रातःकालके

सूर्यके समान अरुण प्रभाववाले तथा सनईके समान सफेद रंगवाले वानरोंसे व्याप्त होनेके

कारण लंकाकी चहारदीवारी चारों ओर कपिलवर्णकी दिखायी देती थी। स्त्रियों और

वृद्धोंसहित समस्त लंकावासी राक्षस चारों ओर आश्चर्यचकित होकर इस दृश्यको देख रहे

थे ।। २८-२९ ।।

बिभिदुस्ते मणिस्तम्भान् कर्णाट्टशिखराणि च ।

भग्नमन्मथितशृङ्गाणि यन्त्राणि च विचिक्षिपुः ।। ३० ।।

वानर सैनिक वहाँके मणिनिर्मित खम्भों और अत्यन्त ऊँचे-ऊँचे महलोंके कंगूरोंको

तोड़ने-फोड़ने लगे। गोलाबारी करनेवाले जो तोप आदि यन्त्र लगे थे, उनके शिखरोंको चूर-

चूर करके उन्होंने दूर फेंक दिया ।। ३० ।।

परिगृह्य शतघ्नीश्च सचक्राः सहुडोपलाः ।

चिक्षिपुर्भुजवेगेन लङ्कामध्ये महास्वनाः ।। ३१ ।।

पहियोंवाली तोपों, शृंगों और गोलोंको ले-लेकर महान् कोलाहल करते हुए वानर

अपनी भुजाओंके वेगसे उन्हें लंकामें फेंकने लगे ।। ३१ ।।

प्राकारस्थाश्च ये केचिन्निशाचरगणास्तथा ।

प्रदुद्रुवुस्ते शतशः कपिभिः समभिद्रुताः ।। ३२ ।।

जो कोई निशाचर चहारदीवारीकी रक्षाके लिये सैकड़ोंकी संख्यामें वहाँ खड़े थे, वे सब

वानरोंद्वारा खदेड़े जानेपर भाग खड़े हुए ।। ३२ ।।

ततस्तु राजवचनाद् राक्षसाः कामरूपिणः ।

निर्ययुर्विकृताकाराः सहस्रशतसङ्घशः ।। ३३ ।।