महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1920, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंषडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
प्रहस्त और धूम्राक्षके वधसे दुःखी हुए रावणका कुम्भकर्णको जगाना और उसे युद्धमें भेजना
मार्कण्डेय उवाच
ततः प्रहस्तः सहसा समभ्येत्य विभीषणम् ।
गदया ताडयामास विनद्य रणकर्कशः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर युद्धमें निष्ठुर पराक्रम दिखानेवाले प्रहस्तने सहसा विभीषणके पास पहुँचकर गर्जना करते हुए उनपर गदासे आघात किया ॥ १ ॥
स तयाभिहतो धीमान् गदया भीमवेगया ।
नाकम्पत महाबाहुर्हिमवानिव सुस्थिरः ॥ २ ॥
भयानक वेगवाली उस गदासे आहत होकर भी बुद्धिमान् महाबाहु विभीषण विचलित नहीं हुए। वे हिमालयके समान सुस्थिरभावसे खड़े रहे ॥ २ ॥
ततः प्रगृह्य विपुलां शतघण्टां विभीषणः ।
अनुमन्त्र्य महाशक्तिं चिक्षेपास्य शिरः प्रति ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् विभीषणने एक विशाल महाशक्ति हाथमें ली, जिसमें शोभाके लिये सौ घंटियाँ लगी हुई थीं। उसे अभिमन्त्रित करके उन्होंने प्रहस्तके मस्तकपर दे मारा ॥ ३ ॥
पतन्त्या स तया वेगाद् राक्षसोऽशनिवेगया ।
हृत्तोत्तमाङ्गो ददृशे वातरुग्ण इव द्रुमः ॥ ४ ॥
विद्युत्के समान वेगवाली उस महाशक्तिका वेगपूर्वक आघात होते ही राक्षस प्रहस्तका मस्तक धड़से अलग हो गया और वह आँधीके द्वारा उखाड़े हुए वृक्षकी भाँति धराशायी दिखायी देने लगा ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वा निहतं संख्ये प्रहस्तं क्षणदाचरम् ।
अभिदुद्राव धूम्राक्षो वेगेन महता कपीन् ॥ ५ ॥
निशाचर प्रहस्तको युद्धमें मारा गया देख धूम्राक्ष बड़े वेगसे वानरोंकी ओर दौड़ा ॥ ५ ॥
तस्य मेघोपमं सैन्यमापतद् भीमदर्शनम् ।
दृष्ट्वैव सहसा दीर्णा रणे वानरपुङ्गवाः ॥ ६ ॥
मेघोंकी काली घटाके समान भयानक दिखायी देनेवाली उसकी सेनाको आते देख सभी श्रेष्ठ वानर सहसा भयभीत होकर युद्धसे भाग चले ॥ ६ ॥