भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2028, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2028

अहं तु त्वां ब्रवीम्येतद् भक्तोऽसीति हितेप्सया ॥ ७ ॥ मरे हुए मनुष्यकी कीर्ति मुर्देके गलेमें पड़ी हुई मालाके समान व्यर्थ है। तुम मेरे भक्त हो, इसलिये तुम्हारे हितकी इच्छासे मैं ये सब बातें कहता हूँ ॥ ७ ॥ भक्तिमन्तो हि मे रक्ष्या इत्येतेनापि हेतुना । भक्तोऽयं परया भक्त्या मामित्येव महाभुज । ममापि भक्तिरुत्पन्ना स त्वं कुरु वचो मम ॥ ८ ॥ मुझे अपने भक्तोंकी रक्षा करनी ही चाहिये, इसलिये भी तुमसे तुम्हारे हितकी बात कहता हूँ। महाबाहो! यह मेरा भक्त है, परम भक्तिभावसे मेरा भजन करता है, यह सोचकर मेरे मनमें भी तुम्हारे प्रति स्नेह जाग उठा है। अतः तुम मेरी आज्ञाका पालन करो ॥ ८ ॥ अस्ति चात्र परं किञ्चिदध्यात्मं देवनिर्मितम् । अतश्च त्वां ब्रवीम्येतत् क्रियतामविशङ्कया ॥ ९ ॥ इस सम्बन्धमें एक देवविहित आध्यात्मिक रहस्य है। इसी कारण तुमसे कह रहा हूँ कि तुम बेखटके यही कार्य करो, जिसे मैंने तुम्हें बतलाया है ॥ ९ ॥ देवगुह्यं त्वया ज्ञातुं न शक्यं पुरुषर्षभ । तस्मान्नाख्यामि ते गुह्यं काले वेत्स्यति तद् भवान् ॥ १० ॥ पुरुषरत्न! देवताओंकी गुप्त बात तुम नहीं समझ सकते, इसलिये वह गोपनीय रहस्य तुम्हें नहीं बता रहा हूँ। समय आनेपर तुम सब कुछ अपने-आप जान लोगे ॥ १० ॥ पुनरुक्तं च वक्ष्यामि त्वं राधेय निबोध तत् । मास्मै ते कुण्डले दद्या भिक्षिते वज्रपाणिना ॥ ११ ॥ राधानन्दन! मैं फिर अपनी कही हुई बात दोहराता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो—'इन्द्रके माँगनेपर भी तुम उन्हें अपने वे कुण्डल न देना' ॥ ११ ॥ शोभसे कुण्डलाभ्यां च रुचिराभ्यां महाद्युते । विशाखयोर्मध्यगतः शशीव विमले दिवि ॥ १२ ॥ महाद्युते! तुम इन दोनों मनोहर कुण्डलोंसे निर्मल आकाशमें विशाखा नामक दो नक्षत्रोंके बीच प्रकाशित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते हो ॥ १२ ॥ कीर्तिंश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्येति विद्धि तत् । प्रत्याख्येयस्त्वया तात कुण्डलार्थे सुरेश्वरः ॥ १३ ॥ तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि जीवित पुरुषके लिये ही कीर्ति प्रशंसनीय है। अतः तात! तुम्हें कुण्डलके लिये आये हुए देवराज इन्द्रको देनेसे इनकार कर देना चाहिये ॥ १३ ॥ शक्या बहुविधैर्वाक्यैः कुण्डलेप्सा त्वयानघ । विहन्तुं देवराजस्य हेतुयुक्तैः पुनः पुनः ॥ १४ ॥

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 2028, कुल 2580 में से · BharatKosha