भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2154, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2154

⬅ विषय-सूची (TOC)

षष्ठोऽध्यायः

युधिष्ठिरद्वारा दुर्गादेवीकी स्तुति और देवीका प्रत्यक्ष प्रकट

होकर उन्हें वर देना

वैशम्पायन उवाच

विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिरः ।

अस्तुवन्मनसा देवीं दुर्गां त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! विराटके रमणीय नगरमें प्रवेश करते समय महाराज

युधिष्ठिरने मन-ही-मन त्रिभुवनकी अधीश्वरी दुर्गादेवीका इस प्रकार स्तवन किया— ॥ १ ॥

यशोदागर्भसम्भूतां नारायणवरप्रियाम् ।

नन्दगोपकुले जातां मङ्गल्यां कुलवर्धिनीम् ॥ २ ॥

कंसविद्रावणकरीमसुराणां क्षयंकरीम् ।

शिलातटविनिक्षिप्तामाकाशं प्रति गामिनीम् ॥ ३ ॥

वासुदेवस्य भगिनीं दिव्यमाल्यविभूषिताम् ।

दिव्याम्बरधरां देवीं खड्गखेटकधारिणीम् ॥ ४ ॥

‘जो यशोदाके गर्भसे प्रकट हुई है, जो भगवान् नारायणको अत्यन्त प्रिय है, नन्दगोपके

कुलमें जिसने अवतार लिया है, जो सबका मंगल करनेवाली तथा कुलको बढ़ानेवाली है,

जो कंसको भयभीत करनेवाली और असुरोंका संहार करनेवाली है, कंसके द्वारा पत्थरकी

शिलापर पटकी जानेपर जो आकाशमें उड़ गयी थी, जिसके अंग दिव्य गन्धमाला एवं

आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा है, जो हाथोंमें ढाल और

तलवार धारण करती है, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी भगिनी उस दुर्गादेवीका मैं चिन्तन करता

हूँ ॥ २—४ ॥

भारावतरणे पुण्ये ये स्मरन्ति सदाशिवाम् ।

तान् वै तारयसे पापात् पङ्के गामिव दुर्बलाम् ॥ ५ ॥

‘पृथ्वीका भार उतारनेवाली पुण्यमयी देवि! तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो।

जो लोग तुम्हारा स्मरण करते हैं, निश्चय ही तुम उन्हें पाप और उसके फलस्वरूप होनेवाले

दुःखसे उबार लेती हो; ठीक उसी तरह, जैसे कोई पुरुष कीचड़में फँसी हुई दुर्बल गायका

उद्धार कर देता है’ ॥ ५ ॥

स्तोतुं प्रचक्रमे भूयो विविधैः स्तोत्रसम्भवैः ।

आमन्त्र्य दर्शनाकाङ्क्षी राजा देवीं सहानुजः ॥ ६ ॥

नमोऽस्तु वरदे कृष्णे कुमारि ब्रह्मचारिणि ।