महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2227, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसा गृहीता विधुन्वाना भूमावाक्षिप्य कीचकम् ।
सभां शरणमागच्छद् यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
इस प्रकार पकड़में आनेपर कीचकको धरतीपर गिराकर भयसे काँपती हुई द्रौपदीने भागकर उस राज-सभाकी शरण ली, जहाँ राजा युधिष्ठिर विद्यमान थे ॥ ९ ॥
तां कीचकः प्रधावन्तीं केशपाशे परामृशत् ।
अथैनां पश्यतो राज्ञः पातयित्वा पदावधीत् ॥ १० ॥
कीचकने भी उठकर भागती हुई द्रौपदीका पीछा किया और उसका केशपाश पकड़ लिया। फिर उसने राजाके देखते-देखते उसे पृथ्वीपर गिराकर लात मारी ॥ १० ॥
तस्य योऽसौ तदार्केण राक्षसः संनियोजितः ।
स कीचकमपोवाह वातवेगेन भारत ॥ ११ ॥
भारत! इतनेमें ही भगवान् सूर्यने जिस राक्षसको द्रौपदीकी रक्षाके लिये नियुक्त कर रखा था, उसने कीचकको पकड़कर आँधीके समान वेगसे दूर फेंक दिया ॥ ११ ॥
स पपात तदा भूमौ रक्षोबलसमाहतः ।
विघूर्णमानो निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ १२ ॥
राक्षसद्वारा बलपूर्वक आहत होकर कीचकके सारे शरीरमें चक्कर आ गया और वह जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १२ ॥
(सभायां पश्यतो राज्ञो विराटस्य महात्मनः ।
ब्राह्मणानां च वृद्धानां क्षत्रियाणां च पश्यताम् ॥
तस्याः पादाभितप्ताया मुखाद् रुधिरमास्रवत् ।
तां दृष्ट्वा तत्र ते सभ्या हाहाभूताः समन्ततः ॥
न युक्तं सूतपुत्रेति कीचकेति च मानवाः ।
किमियं वध्यते बाला कृपणा चाप्यबान्धवा ॥)
सभामें महामना राजा विराटके तथा वृद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके देखते-देखते कीचकके पादप्रहारसे पीड़ित हुई द्रौपदीके मुँहसे रक्त बहने लगा। उसे उस अवस्थामें देखकर समस्त सभासद् सब ओरसे हाहाकार कर उठे और सब लोग कहने लगे—'सूतपुत्र कीचक! तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं है। यह बेचारी अबला अपने बन्धु-बान्धवोंसे रहित है। इसे क्यों पीड़ा दे रहे हो?'
तां चासीनौ ददृशतुर्भीमसेनयुधिष्ठिरौ ।
अमृष्यमाणौ कृष्णायाः कीचकेन पराभवम् ॥ १३ ॥
उस समय भीमसेन और युधिष्ठिर भी राजसभामें बैठे हुए थे। उन्होंने कीचकके द्वारा द्रौपदीका यह अपमान अपनी आँखों देखा; जिसे वे सहन न कर सके ॥ १३ ॥
तस्य भीमो वधं प्रेप्सुः कीचकस्य दुरात्मनः ।
दन्तैर्दन्तांस्तदा रोषान्निष्पिपे ष महामनाः ॥ १४ ॥