महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2233, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायन उवाच
एवं विलपमानायां पाञ्चाल्यां मत्स्यपुङ्गवः । अशक्तः कीचकं तत्र शासितुं बलदर्पितम् ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीके इस प्रकार विलाप करनेपर भी मत्स्यराज विराट बलाभिमानी कीचकपर शासन करनेमें असमर्थ ही रहे। विराटराजः सूतं तु सान्त्वेनैव न्यवारयत् । कीचकं मत्स्यराजेन कृतागसमनिन्दिता ॥ नापराधानुरूपेण दण्डेन प्रतिपादितम् । पाञ्चालराजस्य सुता दृष्ट्वा सुरसुतोपमा ॥ धर्मज्ञा व्यवहाराणां कीचकं कृतकिल्बिषम् । पुनः प्रोवाच राजानं स्मरन्ती धर्ममुत्तमम् ॥ सम्प्रेक्ष्य च वरारोहा सर्वांस्तत्र सभासदः । विराटं चाह पाञ्चाली दुःखेनाविष्टचेतना ॥) उन्होंने शान्तिपूर्वक समझा-बुझाकर ही सूतको वैसा करनेसे मना किया। यद्यपि कीचकने भारी अपराध किया था, तो भी मत्स्यराजने उसे अपराधके अनुसार दण्ड नहीं दिया; यह देख देवकन्याके समान सुन्दरी एवं व्यवहार-धर्मको जाननेवाली साध्वी द्रौपदी उत्तम धर्मका स्मरण करती हुई राजा विराट तथा समस्त सभासदोंकी ओर देखकर दुःखी हृदयसे इस प्रकार बोली—।
येषां वैरी न स्वपिति षष्ठेऽपि विषये वसन् । तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २२ ॥ ‘जिन मेरे पतियोंके वैरीको पाँच देशोंको पार करके छठे देशमें रहनेपर भी भयके मारे नींद नहीं आती, आज उन्हींकी मानिनी पत्नी मुझ असहाय अबलाको एक सूतपुत्रने लातसे मारा है ॥ २२ ॥
ये दद्युर्न च याचेयुर्ब्राह्मण्याः सत्यवादिनः । तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २३ ॥ ‘जो सदा दूसरोंको देते हैं, किंतु किसीसे याचना नहीं करते, जो ब्राह्मणभक्त तथा सत्यवादी हैं, उन्हींकी मुझ मानिनी पत्नीको सूतपुत्रने लात मारी है ॥ २३ ॥
येषां दुन्दुभिनिर्घोषो ज्याघोषः श्रूयतेऽनिशम् । तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २४ ॥ ‘जिनके धनुषकी टंकार सदा देव-दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनिके समान सुनायी पड़ती है, उन्हींकी मुझ मानिनी पत्नीको सूतपुत्रने लातसे मारा है ॥ २४ ॥
ये च तेजस्विनो दान्ता बलवन्तोऽतिमानिनः । तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ॥ २५ ॥