भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2313

तेषामज्ञातचर्यायामस्मिन् वर्षे त्रयोदशे ॥ ३ ॥ 'इस तेरहवें वर्षमें पाण्डवोंके अज्ञातवासका अधिकांश समय बीत चुका है और थोड़े ही दिन शेष हैं ॥ ३ ॥ अस्य वर्षस्य शेषं चेद् व्यतीयुरिह पाण्डवाः । निवृत्तसमयास्ते हि सत्यव्रतपरायणाः ॥ ४ ॥ क्षरन्त इव नागेन्द्राः सर्वे ह्याशीविषोपमाः । दुःखा भवेयुः संरब्धाः कौरवान् प्रति ते ध्रुवम् ॥ ५ ॥ 'यदि शेष समय भी पाण्डव इसी प्रकार यहाँ व्यतीत कर लें, तो वे प्रतिज्ञापालनके भारसे मुक्त हो जायेंगे। फिर तो वे सत्यव्रती पाण्डव मदकी धारा बहानेवाले गजराजों और विषधर सर्पोंके समान क्रोधमें भरकर निश्चय ही कौरवोंके लिये दुःखदायी हो जायेंगे ॥ ४-५ ॥ सर्वे कालस्य वेत्तारः कृच्छ्ररूपधराः स्थिताः । प्रविशेयुर्जितक्रोधास्तावदेव पुनर्वनम् ॥ ६ ॥ तस्मात् क्षिप्रं बुभूषध्वं यथा तेऽत्यन्तमव्ययम् । राज्यं निर्द्वन्द्वमव्यग्रं निःसपत्नं चिरं भवेत् ॥ ७ ॥ 'वे सब समयकी नियत अवधिको जानते हैं; अतः कही ऐसा वेष धारण करके छिपे होंगे, जिससे उन्हें पहचानना कठिन हो गया है; इसलिये आपलोग शीघ्र उनका पता लगानेकी चेष्टा करें, जिससे वे क्रोधको दबाकर उतने ही समयके लिये अर्थात् बारह वर्षोंके लिये फिर वनमें चले जायें। ऐसा होनेपर ही मेरा यह राज्य दीर्घकाल-तकके लिये निर्द्वन्द्व, व्यग्रताशून्य तथा निष्कण्टक हो जायगा' ॥ ६-७ ॥ अथाब्रवीत् ततः कर्णः क्षिप्रं गच्छन्तु भारत । अन्ये धूर्ता नरा दक्षा निभृताः साधुकारिणः ॥ ८ ॥ यह सुनकर कर्णने कहा—'भरतनन्दन! तब शीघ्र ही दूसरे कार्यकुशल गुप्तचर भेजे जायँ, जो धूर्त होनेके साथ ही छिपे रहकर अपना कार्य अच्छी तरह कर सकें ॥ ८ ॥ चरन्तु देशान् संवीताः स्फीताञ्जनपदाकुलान् । तत्र गोष्ठीषु रम्यासु सिद्धप्रव्रजितेषु च ॥ ९ ॥ परिचारेषु तीर्थेषु विविधेष्वाकरेषु च । विज्ञातव्या मनुष्यैस्तैस्तर्कया सुविनीतया ॥ १० ॥ 'वे गुप्तरूपसे धन-धान्यसम्पन्न एवं जनसमुदायसे भरे हुए देशोंमें जायँ और वहाँ सुरम्य सभाओंमें, सिद्ध-संन्यासी महात्माओंके आश्रमोंमें, राजनगरोंमें, नाना प्रकारके तीर्थों और सर्वोत्तम स्थानोंमें, वहाँ निवास करनेवाले मनुष्योंसे विनयपूर्ण युक्तिसे पूछकर उनका पता लगावें ॥ ९-१० ॥ विविधैस्तत्परैः सम्यक् तज्ज्ञैर्निपुणसंवृतैः ।