महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2314, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्वेष्टव्याः सुनिपुणैः पाण्डवाश्छन्नवासिनः ॥ ११ ॥ नदीकुञ्जेषु तीर्थेषु ग्रामेषु नगरेषु च । आश्रमेषु च रम्येषु पर्वतेषु गुहासु च ॥ १२ ॥ ‘पाण्डव छिपकर किसी गुप्त स्थानमें निवास करते होंगे; अतः जो कार्यसाधनमें तत्पर, उन्हें अच्छी तरह पहचाननेवाले, बुद्धिमानीसे स्वयं भी छिपकर कार्य करनेवाले और अत्यन्त कुशल हों, ऐसे अनेक गुप्तचर नदी-तटवर्ती कुंजों, तीर्थों, गाँवों, नगरों, रमणीय आश्रमों, पर्वतों तथा गुफाओंमें जा-जाकर उनकी खोज करें’ ॥ ११-१२ ॥ अथाग्रजानन्तरजः पापभावानुरागवान् । ज्येष्ठं दुःशासनस्तत्र भ्राता भ्रातरमब्रवीत् ॥ १३ ॥ तदनन्तर सदा पापभावनामें अनुरक्त रहनेवाला दुर्योधनसे छोटा भाई दुःशासन अपने बड़े भाईसे बोला— ॥ १३ ॥ येषु नः प्रत्ययो राजंश्चारेषु मनुजाधिप । ते यान्तु दत्तदेया वै भूयस्तान् परिमार्गितुम् ॥ १४ ॥ ‘राजन्! नरेश्वर! जिन गुप्तचरोंपर हमारा अधिक विश्वास हो, उन्हें देनेयोग्य सब साधन देकर पुनः पाण्डवोंकी खोजके लिये भेजा जाय ॥ १४ ॥ एतच्च कर्णो यत् प्राह सर्वमीहामहे तथा । यथोद्दिष्टं चराः सर्वे मृगयन्तु यतस्ततः ॥ १५ ॥ ‘कर्णने जो बात कही है, वह सब हम करें। इनके बताये हुए स्थानोंमें जहाँ-तहाँ घूमकर सभी गुप्तचर उनका पता लगावें’ ॥ १५ ॥ एते चान्ये च भूयांसो देशाद् देशं यथाविधि । न तु तेषां गतिर्वासः प्रवृत्तिश्चोपलभ्यते ॥ १६ ॥ ‘ये तथा और भी बहुत-से लोग एक देशसे दूसरे देशमें विधिपूर्वक खोज करें। अभीतक तो पाण्डवोंके गन्तव्य स्थान, निवास तथा प्रवृत्तिका कुछ भी पता नहीं लग रहा है ॥ १६ ॥ अत्यन्तं वा निगूढास्ते पारं चोर्मिमतो गताः । व्यालैश्चापि महारण्ये भक्षिताः शूरमानिनः ॥ १७ ॥ ‘या तो वे अधिक गुप्त स्थानमें छिपे हैं या समुद्रके उस पार चले गये हैं। यह भी सम्भव है कि अपनेको शूरवीर माननेवाले इन पाण्डवोंको उस महान् वनमें अजगर निगल गये हों ॥ १७ ॥ अथवा विषमं प्राप्य विनष्टाः शाश्वतीः समाः । तस्मान्मानसमव्यग्रं कृत्वा त्वं कुरुनन्दन । कुरु कार्यं महोत्साहं मन्यसे यन्नराधिप ॥ १८ ॥