महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2320, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरे जनपदे चापि यत्र राजा युधिष्ठिरः । दानशीलो वदान्यश्च निभृतो ह्रीनिषेवकः । जनो जनपदे भाव्यो यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥ ‘तात! जिस नगर या राष्ट्रमें राजा युधिष्ठिर निवास करते होंगे, वहाँके राजाओंका अकल्याण नहीं हो सकता। जहाँ राजा युधिष्ठिर होंगे, उस जनपदके लोगोंको दानशील, उदार, विनयी और लज्जाशील होना चाहिये ॥ १४-१५ ॥
प्रियवादी सदा दान्तो भव्यः सत्यपरो जनः । हृष्टः पुष्टः शुचिर्दक्षो यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥ १६ ॥ ‘जहाँ राजा युधिष्ठिर होंगे, वहाँके मनुष्य सदा प्रिय वचन बोलनेवाले, जितेन्द्रिय, कल्याणभागी, सत्यपरायण, हृष्ट-पुष्ट, पवित्र और कार्यकुशल होंगे ॥ १६ ॥
नासूयको न चापीर्षुर्नाभिमानी न मत्सरी । भविष्यति जनस्तत्र स्वयं धर्ममनुव्रतः ॥ १७ ॥ ‘वहाँ कोई न तो दूसरेके दोष देखनेवाला होगा और न ईर्ष्यालु। न किसीमें अभिमान होगा और न मात्सर्य (द्वेष)। वहाँके सब लोग स्वयं ही धर्ममें तत्पर होंगे ॥ १७ ॥
ब्रह्मघोषाश्च भूयांसः पूर्णाहुत्यस्तथैव च । क्रतवश्च भविष्यन्ति भूयांसो भूरिदक्षिणाः ॥ १८ ॥ ‘उस देश या जनपदमें प्रचुररूपसे वेदध्वनि होती होगी, यज्ञोंमें पूर्णाहुतियाँ दी जाती होंगी और बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले बहुत-से यज्ञ हो रहे होंगे ॥ १८ ॥
सदा च तत्र पर्जन्यः सम्यग्वर्षी न संशयः । सम्पन्नसस्या च मही निरातङ्का भविष्यति ॥ १९ ॥ ‘वहाँ मेघ सदा ठीक-ठीक वर्षा करता होगा, इसमें संशय नहीं है। वहाँकी भूमिपर खेती लहलहाती होगी और वहाँ निवास करनेवाली प्रजा सर्वथा निर्भय होगी ॥ १९ ॥
गुणवन्ति च धान्यानि रसवन्ति फलानि च । गन्धवन्ति च माल्यानि शुभशब्दा च भारती ॥ २० ॥ ‘वहाँ गुणयुक्त धान्य, सरस फल, सुगन्धयुक्त माला और मांगलिक शब्दोंसे युक्त वाणी सुलभ होगी ॥ २० ॥
वायुश्च सुखसंस्पर्शो निष्प्रतीपं च दर्शनम् । न भयं त्वाविशेत् तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥ २१ ॥ ‘वहाँ जिसका स्पर्श सुखदायक हो, ऐसी शीतल एवं मन्द वायु चलती होगी। धर्म और ब्रह्मके स्वरूपका विचार पाखण्डशून्य होगा। जहाँ राजा युधिष्ठिर होंगे, वहाँ भयका प्रवेश नहीं हो सकता ॥ २१ ॥
गावश्च बहुलास्तत्र न कृशा न च दुर्बलाः । पयांसि दधिसर्पींषि रसवन्ति हितानि च ॥ २२ ॥