महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2324, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'अज्ञातवासका समय पूर्ण कर लेनेपर कुन्तीके वे महाबली, अमितपराक्रमी और महात्मा पुत्र पाण्डव महान् उत्साहसे सम्पन्न हो जायँगे ॥ ७ ॥ तस्माद् बलं च कोषश्च नीतिश्चापि विधीयताम् । यथा कालोदये प्राप्ते सम्यक् तैः संदधामहे ॥ ८ ॥ 'अतः इस समय तुम्हें अपनी सेना, कोष और नीति ऐसी बनायी रखनी चाहिये, जिससे समय आनेपर हम उनके साथ यथावत् सन्धि (मेल अथवा बाण-संधान) कर सकें ॥ ८ ॥ तात बुद्ध्यापि तत् सर्वं बुध्यस्व बलमात्मनः । नियतं सर्वमित्रेषु बलवत्स्वबलेषु च ॥ ९ ॥ 'तात! तुम स्वयं बुद्धिसे भी विचारकर अपनी सम्पूर्ण शक्ति कितनी है, इसकी जानकारी प्राप्त कर लो। तुम्हारे बलवान् और निर्बल सब प्रकारके मित्रोंमें निश्चित बल कितना है, यह भी जान लेना चाहिये ॥ ९ ॥ उच्चावचं बलं ज्ञात्वा मध्यस्थं चापि भारत । प्रहृष्टमप्रहृष्टं च संदधाम तथा परैः ॥ १० ॥ 'भारत! उत्तम, मध्यम और अधम तीनों प्रकारकी सेनाओंकी स्थिति समझो। उत्तम और मध्यम सेनाएँ प्रसन्न हैं या अप्रसन्न—इसे जान लो; तब हम शत्रुओंसे सन्धि (मेल या बाण-संधान) कर सकते हैं ॥ १० ॥ साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन बलिकर्मणा । न्यायेनाक्रम्य च परान् बलाच्चानम्य दुर्बलान् ॥ ११ ॥ सान्त्वयित्वा तु मित्राणि बलं चाभाष्यतां सुखम् । सुकोषबलसंवृद्धः सम्यक् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १२ ॥ 'साम (समझाना), दान (धन आदि देना), भेद (शत्रुओंमें फूट डालना), दण्ड देना और कर लेना—इन नीतियोंके द्वारा* शत्रुपर आक्रमण करके, दुर्बलोंको बलसे दबाकर, मित्रोंको मेल-जोलसे अपनाकर और सेनाको मिष्टभाषण एवं वेतन आदि देकर अपने अनुकूल कर लेना चाहिये। इस प्रकार उत्तम कोष और सेनाको बढ़ा लेनेपर तुम अच्छी सफलता प्राप्त कर सकोगे ॥ ११-१२ ॥ योत्स्यसे चापि बलिभिररिभिः प्रत्युपस्थितैः । अन्यैस्त्वं पाण्डवैर्वापि हीनैः स्वबलवाहनैः ॥ १३ ॥ 'उस दशामें बलवान्-से-बलवान् शत्रु क्यों न आ जायँ और वे पाण्डव हों या दूसरे कोई, यदि सेना और वाहन आदिकी दृष्टिसे उनमें अपनी अपेक्षा न्यूनता है तो तुम उन सबके साथ युद्ध कर सकोगे ॥ १३ ॥ एवं सर्वं विनिश्चित्य व्यवसायं स्वधर्मतः । यथाकालं मनुष्येन्द्र चिरं सुखमवाप्स्यसि ॥ १४ ॥