महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2329, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्र यात्रा मम मता यदि ते रोचतेऽनघ । कौरवाणां च सर्वेषां कर्णस्य च महात्मनः ॥ ७ ॥ ‘अनघ! यदि आपको जचे, तो मेरी राय यह है कि समस्त कौरव वीरों और महामना कर्णका भी उस देशपर आक्रमण हो ॥ ७ ॥
एतत् प्राप्तमहं मन्ये कार्यमात्ययिकं हि नः । राष्ट्रं तस्याभियास्यामो बहुधान्यसमाकुलम् ॥ ८ ॥ ‘मैं समझता हूँ; इसके लिये उपयुक्त अवसर प्राप्त हुआ है। यह हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक कार्य है। हम प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न मत्स्यराष्ट्रपर चढ़ाई करें ॥
आददामोऽस्य रत्नानि विविधानि वसूनि च । ग्रामान् राष्ट्राणि वा तस्य हरिष्यामो विभागशः ॥ ९ ॥ ‘राजा विराटके यहाँ नाना प्रकारके रत्न और धन हैं। हम वे सब ले लेंगे और उनके गाँव तथा सम्पूर्ण राष्ट्रको जीतकर आपसमें बाँट लेंगे ॥ ९ ॥
अथवा गोसहस्राणि शुभानि च बहूनि च । विविधानि हरिष्यामः प्रतिपीड्य पुरं बलात् ॥ १० ॥ ‘अथवा उनके यहाँ सहस्रों सुन्दर गौओंके बहुत-से समुदाय हैं; अतः बलपूर्वक उनके नगरमें उत्पात मचाकर उन समस्त गौओंका अपहरण कर लेंगे ॥ १० ॥
कौरवैः सह संगत्य त्रिगर्तैश्च विशाम्पते । गास्तस्यापहरामोऽद्य सर्वैश्चैव सुसंहताः ॥ ११ ॥ ‘महाराज! कौरवोंके साथ संगठित त्रिगर्तदेशीय सैनिकोंकी सहायतासे हम सब मिलकर विराटकी गौओंको हर लेंगे ॥ ११ ॥
संविभागेन कृत्वा तु निबध्नीमोऽस्य पौरुषम् । हत्वा चास्य चमूं कृत्स्नां वशमेवानयामहे ॥ १२ ॥ ‘और हम आपसमें विभाजन करके उन्हें अपने यहाँ बाँध लेंगे। साथ ही मत्स्यराजके सामर्थ्यको नष्ट करके उसकी सारी सेनाको अपने अधीन कर लेंगे ॥ १२ ॥
तं वशे न्यायतः कृत्वा सुखं वत्स्यामहे वयम् । भवतां बलवृद्धिश्च भविष्यति न संशयः ॥ १३ ॥ ‘विराटको नीतिसे वशमें करके हम सुखसे रहेंगे। इससे आपलोगोंकी सेना और शक्तिकी वृद्धि भी होगी; इसमें संशय नहीं है' ॥ १३ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कर्णो राजानमब्रवीत् । सूक्तं सुशर्मणा वाक्यं प्राप्तकालं हितं च नः ॥ १४ ॥ त्रिगर्तराजका यह कथन सुनकर कर्णने राजा दुर्योधनसे कहा—'सुशर्माने ठीक कहा है; यह समयोचित होनेके साथ ही हमारे लिये हितकर भी है ॥ १४ ॥
तस्मात् क्षिप्रं विनिर्यामो योजयित्वा वरूथिनीम् ।