महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2330, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंविभज्य चाप्यनीकानि यथा वा मन्यसेऽनघ ॥ १५ ॥ 'इसलिये सेनाको सुसज्जित करके उसे कई टुकड़ियोंमें बाँटकर हमलोग शीघ्र यहाँसे कूच कर देंगे। अथवा अनघ! आपको जैसा ठीक लगे, वैसा करें ॥ १५ ॥ प्राज्ञो वा कुरुवृद्धोऽयं सर्वेषां नः पितामहः ॥ आचार्यश्च यथा द्रोणः कृपः शारद्वतस्तथा । मन्यन्ते ते यथा सर्वे तथा यात्रा विधीयताम् ॥ १६ ॥ 'अथवा कुरुकुलमें सबसे वृद्ध हमारे पितामह परम बुद्धिमान् भीष्म, आचार्य द्रोण तथा शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य—ये लोग जैसे ठीक समझें, वैसे ही यात्रा करनी चाहिये ॥ १६ ॥ सम्मन्त्र्य चाशु गच्छामः साधनार्थं महीपतेः । किं च नः पाण्डवैः कार्यं हीनार्थबलपौरुषैः ॥ १७ ॥ 'आपसमें अच्छी तरह सलाह करके हमें राजा विराटको वशमें करनेके लिये शीघ्र प्रस्थान कर देना चाहिये। पाण्डवलोग धन, बल तथा पौरुष तीनोंसे हीन हैं, अतः उनसे हमें क्या काम है? ॥ १७ ॥ अत्यन्तं वा प्रणष्टास्ते प्राप्ता वापि यमक्षयम् । यामो राजन् निरुद्विग्ना विराटनगरं वयम् । आदास्यामो हि गास्तस्य विविधानि वसूनि च ॥ १८ ॥ 'राजन्! वे अत्यन्त अदृश्य (छिपे हुए) हों या यमराज-के घर पहुँच गये हों, हमें तो उद्वेगशून्य होकर विराटनगरकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ हमलोग विराटकी गौओंको तथा उनके विविध धन-रत्नोंको हस्तगत कर लेंगे' ॥ १८ ॥
<div align="center">वैशम्पायन उवाच</div>ततो दुर्योधनो राजा वाक्यमादाय तस्य तत् । वैकर्तनस्य कर्णस्य क्षिप्रमाज्ञापयत् स्वयम् ॥ १९ ॥ शासने नित्यसंयुक्तं दुःशासनमनन्तरम् । सह वृद्धैस्तु सम्मन्त्र्य क्षिप्रं योजय वाहिनीम् ॥ २० ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा दुर्योधनने सूर्यपुत्र कर्णकी बात मानकर अपनी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा संनद्ध रहनेवाले छोटे भाई दुःशासनको स्वयं ही तुरंत आदेश दे दिया—'वृद्धजनोंकी सम्मति लेकर शीघ्र अपनी सेनाको प्रस्थानके लिये तैयार करो ॥ १९-२० ॥ यथोद्देशं च गच्छामः सहितास्तत्र कौरवैः । सुशर्मा च यथोद्दिष्टं देशं यातु महारथः । त्रिगर्तैः सहितो राजा समग्रबलवाहनः ॥ २१ ॥