महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2347, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यभाषन्महाबाहुं भीमसेनमरिंदमम् ॥ ११ ॥ उनके इस प्रकार अत्यन्त भयभीत होनेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु भीमसेनसे कहा— ॥ ११ ॥ मत्स्यराजः परामृष्टस्त्रिगर्तेन सुशर्मणा । तं मोचय महाबाहो न गच्छेद द्विषतां वशम् ॥ १२ ॥ ‘महाबाहो! त्रिगर्तराज सुशर्माने मत्स्यराजको पकड़ लिया है। उन्हें शीघ्र छुड़ाओ; जिससे वे शत्रुओंके वशमें न पड़ जायें ॥ १२ ॥ उषिताः स्म सुखं सर्वे सर्वकामैः सुपूजिताः । भीमसेन त्वया कार्या तस्य वासस्य निष्कृतिः ॥ १३ ॥ ‘हम सब लोग उनके यहाँ सुखपूर्वक रहे हैं और उन्होंने हमें सब प्रकारकी अभीष्ट वस्तुएँ देकर हमारा भलीभाँति सत्कार किया है। अतः भीमसेन! तुम्हें उनके घरमें रहनेके उपकारका बदला चुकाना चाहिये’ ॥ १३ ॥
भीमसेन उवाच
अहमेनं परित्रास्ये शासनात् तव पार्थिव । पश्य मे सुमहत् कर्म युध्यतः सह शत्रुभिः ॥ १४ ॥ भीमसेन बोले—महाराज! आपकी आज्ञासे मैं इन्हें सुशर्माके हाथोंसे छुड़ा लूँगा। आज आप शत्रुओंके साथ युद्ध करते समय मेरे महान् पराक्रमको देखें ॥ १४ ॥ स्वबाहुबलमाश्रित्य तिष्ठ त्वं भ्रातृभिः सह । एकान्तमाश्रितो राजन् पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ॥ १५ ॥ मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके लडूंगा। राजन्! आज आप भाइयोंसहित एकान्तमें खड़े होकर अब मेरा पराक्रम देखें ॥ १५ ॥ सुस्कन्धोऽयं महावृक्षो गदारूप इव स्थितः । अहमेनम्पारुज्य द्रावयिष्यामि शात्रवान् ॥ १६ ॥ यह सामने जो महान् वृक्ष है, इसकी शाखाएँ बड़ी सुन्दर हैं। यह तो मानो गदाके ही रूपमें खड़ा है। अतः मैं इसीको उखाड़कर इसके द्वारा शत्रुदलको मार भगाऊँगा ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
तं मत्तमिव मातङ्गं वीक्षमाणं वनस्पतिम् । अब्रवीद् भ्रातरं वीरं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! यह कहकर भीमसेन मदोन्मत्त गजराजकी भाँति उस वृक्षकी ओर देखने लगे। तब धर्मराज युधिष्ठिरने अपने वीर भ्रातासे कहा— ॥ १७ ॥ मा भीम साहसं कार्षीस्तिष्ठत्वेष वनस्पतिः । मा त्वां वृक्षेण कर्माणि कुर्वाणमतिमानुषम् ॥ १८ ॥