महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चषष्टितमोऽध्यायः
अर्जुन और दुर्योधनका युद्ध, विकर्ण आदि योद्धाओंसहित दुर्योधनका युद्धके मैदानसे भागना
वैशम्पायन उवाच
भीष्मे तु संग्रामशिरो विहाय पलायमाने धृतराष्ट्रपुत्रः । उत्सृज्य केतुं विनदन् महात्मा धनुर्विगृह्यार्जुनमाससाद ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब भीष्मजी युद्धका मुहाना छोड़कर दूर हट गये, तब धृतराष्ट्र-पुत्र महामना दुर्योधन अपने रथकी पताका फहराकर हाथमें धनुष ले सिंहनाद करता हुआ अर्जुनपर चढ़ आया ॥ १ ॥
स भीमधन्वानमुदग्रवीर्यं धनंजयं शत्रुगणे चरन्तम् । आकर्णपूर्णायतचोदितेन विव्याध भल्लेन ललाटमध्ये ॥ २ ॥ उस समय भयंकर धनुष धारण करनेवाले प्रचण्ड पराक्रमी धनंजय शत्रुसेनामें विचर रहे थे। दुर्योधनने धनुषको कानतक खींचकर छोड़े हुए भल्ल नामक बाणसे उनके ललाटमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २ ॥
स तेन बाणेन समर्पितेन जाम्बूनदाग्रेण सुसंहितेन । रराज राजन् महनीयकर्मा यथैकपर्वा रुचिरैकशृङ्गः ॥ ३ ॥ वह बाण अर्जुनके ललाटमें धँस गया। राजन्! प्रशंसनीय पराक्रमवाले अर्जुन सुनहरी धारवाले उस धँसे हुए बाणके द्वारा उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे एक सुन्दर शिखरवाला पर्वत अपने ऊपर उगे हुए एक ही बाँसके पेड़से शोभा पा रहा हो ॥ ३ ॥
अथास्य बाणेन विदारितस्य प्रादुर्बभूवासृगजस्रमुष्णम् । स तस्य जाम्बूनदपुङ्खचित्रो भित्त्वा ललाटं सुविराजते स्म ॥ ४ ॥