महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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भोजनानि च हृद्यानि पानानि विविधानि च ।
तन्महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनायुतम् ।
नगरं मत्स्यराजस्य शुशुभे भरतर्षभ ॥ ४० ॥
हजारों गौएँ, रत्न, नाना प्रकारके वस्त्र, आभूषण, मुख्य-मुख्य वाहन, शय्या, भोजनसामग्री तथा भाँति-भाँतिकी पीनेयोग्य उत्तम वस्तुएँ भी अर्पण कीं। जनमेजय! उस समय हजारों-लाखों हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरा हुआ मत्स्यराजका वह नगर मूर्तिमान् महोत्सव-सा सुशोभित हो रहा था ।। ३९-४० ।।
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि उत्तराविवाहे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार व्यासनिर्र्मित श्रीमहाभारत नामक एक लाख श्लोकोंकी संहितामें विराटपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें उत्तराविवाहविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७२ ।।
विराटपर्वकी श्लोक-संख्या
| अनुष्टुप् छन्द | ( अन्य बड़े छन्द ) | बड़े छन्दोंका ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | कुल योग | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | २१२५ | ( १९८ ) | २८३॥ | २४०८॥ |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | २४९ | ( २२॥ ) | ३३॥ | २८२॥ |