भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

अर्जुनको अस्त्र और संगीतकी शिक्षा

वैशम्पायन उवाच

ततो देवाः सगन्धर्वाः समादायार्घ्यमुत्तमम् ।
शक्रस्य मतमाज्ञाय पार्थमानर्चुरञ्जसा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर देवराज इन्द्रका अभिप्राय जानकर देवताओं और गन्धर्वोंने उत्तम अर्घ्य लेकर कुन्तीकुमार अर्जुनका यथोचित पूजन किया ॥ १ ॥

पाद्यमाचमनीयं च प्रतिग्राह्य नृपात्मजम् ।
प्रवेशयामासुरथो पुरन्दरनिवेशनम् ॥ २ ॥
राजकुमार अर्जुनको पाद्य, (अर्घ्य), आचमनीय आदि उपचार अर्पित करके देवताओंने उन्हें इन्द्रभवनमें पहुँचा दिया ॥ २ ॥

एवं सम्पूजितो जिष्णुरुवास भवने पितुः ।
उपशिक्षन् महास्त्राणि ससंहाराणि पाण्डवः ॥ ३ ॥
इस प्रकार देवसमुदायसे पूजित हो पाण्डुकुमार अर्जुन अपने पिताके घरमें रहने और उनसे उपसंहारसहित महान् अस्त्रोंकी शिक्षा ग्रहण करने लगे ॥ ३ ॥

शक्रस्य हस्ताद् दयितं वज्रमस्त्रं च दुःसहम् ।
अशनीश्च महानादा मेघबर्हिणलक्षणाः ॥ ४ ॥
उन्होंने इन्द्रके हाथसे उनके प्रिय एवं दुःसह अस्त्र वज्र और भारी गड़गड़ाहट पैदा करनेवाली उन अशनियोंको ग्रहण किया, जिनका प्रयोग करनेपर जगत्में मेघोंकी घटा घिर आती और मयूर नृत्य करने लगते हैं ॥ ४ ॥

गृहीतास्त्रस्तु कौन्तेयो भ्रातॄन् सस्मार पाण्डवः ।
पुरन्दरनियोगाच्च पञ्चाब्दानवसत् सुखी ॥ ५ ॥
सब अस्त्रोंकी शिक्षा ग्रहण कर लेनेपर पाण्डुपुत्र पार्थने अपने भाइयोंका स्मरण किया। परंतु पुरन्दरके विशेष अनुरोधसे वे (मानव-गणनाके अनुसार) पाँच वर्षोंतक वहाँ सुखपूर्वक ठहरे रहे ॥ ५ ॥

ततः शक्रोऽब्रवीत् पार्थं कृतास्त्रं काल आगते ।
नृत्यं गीतं च कौन्तेय चित्रसेनादवाप्नुहि ॥ ६ ॥
तदनन्तर इन्द्रने अस्त्रशिक्षामें निपुण कुन्ती-कुमारसे उपयुक्त अवसर आनेपर कहा—'कुन्तीनन्दन! तुम चित्रसेनसे नृत्य और गीतकी शिक्षा ग्रहण कर लो' ॥ ६ ॥

वादित्रं देवविहितं नृलोके यन्न विद्यते ।