महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'राजन्! यदि ऐसा हो तो आप हमारे धर्मपरायण राजा अविवेकी और दीर्घसूत्री नहीं समझे जायेंगे ॥ २१ ॥ निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः । न हि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते ॥ २२ ॥ 'शठता करने या जाननेवाले शत्रुओंको शठताके द्वारा ही मारना चाहिये, यह एक सिद्धान्त है। जो स्वयं दूसरोंपर छल-कपटका प्रयोग करता है, उसे छलसे भी मार डालनेमें पाप नहीं बताया गया है ॥ २२ ॥ तथा भारत धर्मेषु धर्मज्ञैरिह दृश्यते । अहोरात्रं महाराज तुल्यं संवत्सरेण ह ॥ २३ ॥ 'भरतवंशी महाराज! धर्मशास्त्रमें इसी प्रकार धर्मपरायण धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा यहाँ एक दिन-रात एक संवत्सरके समान देखा जाता है ॥ २३ ॥ तथैव वेदवचनं श्रूयते नित्यदा विभो । संवत्सरो महाराज पूर्णो भवति कृच्छ्रतः ॥ २४ ॥ 'प्रभो! महाराज! इसी प्रकार सदा यह वैदिक वचन सुना जाता है कि कृच्छ्रव्रतके अनुष्ठानसे एक वर्षकी पूर्ति हो जाती है ॥ २४ ॥ यदि वेदाः प्रमाणान्ते दिवसादूध्वर्मच्युत । त्रयोदश समाः कालो ज्ञायतां परिनिष्ठितः ॥ २५ ॥ 'अच्युत! यदि आप वेदको प्रमाण मानते हैं तो तेरहवें दिनके बाद ही तेरह वर्षोंका समय बीत गया, ऐसा समझ लीजिये ॥ २५ ॥ कालो दुर्योधनं हन्तुं सानुबन्धमरिंदम । एकाग्रां पृथिवीं सर्वां पुरा राजन् करोति सः ॥ २६ ॥ 'शत्रुदमन! यह दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालनेका अवसर आया है। राजन्! वह सारी पृथ्वीको जबतक एक सूत्रमें बाँध ले, उसके पहले ही यह कार्य कर लेना चाहिये ॥ २६ ॥ द्यूतप्रियेण राजेन्द्र तथा तद् भवता कृतम् । प्रायेणाज्ञातचर्यायां वयं सर्वे निपातिताः ॥ २७ ॥ 'राजेन्द्र! जूएके खेलमें आसक्त होकर आपने ऐसा अनर्थ कर डाला कि प्रायः हम सब लोगोंको अज्ञातवासके संकटमें लाकर पटक दिया ॥ २७ ॥ न तं देशं प्रपश्यामि यत्र सोऽस्मान् सुदुर्जनः । न विज्ञास्यति दुष्टात्मा चारैरिति सुयोधनः ॥ २८ ॥ अधिगम्य च सर्वान् नो वनवासमिमं ततः । प्रव्राजयिष्यति पुनर्निंकृत्याधमपूरुषः ॥ २९ ॥