महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! धर्मराज राजा युधिष्ठिरने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेनका मस्तक सूँघकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा— ।। ३६ ।।
असंशयं महाबाहो हनिष्यसि सुयोधनम् । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं सह गाण्डीवधन्वना ।। ३७ ।। 'महाबाहो! इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि तुम तेरहवें वर्षके बाद गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ जाकर युद्धमें सुयोधनको मार डालोगे ।। ३७ ।।
यत् त्वामाभाषसे पार्थ प्राप्तः काल इति प्रभो । अनृतं नोत्सहे वक्तुं न ह्येतन्मम विद्यते ।। ३८ ।। 'किंतु शक्तिशाली वीर कुन्तीकुमार! तुम जो यह कहते हो कि सुयोधनके वधका अवसर आ गया है, वह ठीक नहीं है। मैं झूठ नहीं बोल सकता, मुझमें यह आदत नहीं है ।। ३८ ।।
अन्तरेणापि कौन्तेय निकृतिं पापनिश्चयम् । हन्ता त्वमसि दुर्धर्ष सानुबन्धं सुयोधनम् ।। ३९ ।। 'कुन्तीनन्दन! तुम दुर्धर्ष वीर हो, छल-कपटका आश्रय लिये बिना भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले सुयोधनको सगे-सम्बन्धियोंसहित नष्ट कर सकते हो' ।। ३९ ।।
एवं ब्रुवति भीमं तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । आजगाम महाभागो बृहदश्वो महर्षिः ।। ४० ।। धर्मराज युधिष्ठिर जब भीमसेनसे ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महाभाग महर्षि बृहदश्व वहाँ आ पहुँचे ।। ४० ।।
तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा सम्प्राप्तं धर्मचारिणम् । शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजयामास धर्मराट् ।। ४१ ।। धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरने धर्मानुष्ठान करनेवाले उन महात्माको आया देख शास्त्रीय विधिके अनुसार मधुपर्कद्वारा उनका पूजन किया ।। ४१ ।।
आश्वस्तं चैनमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः । अभिप्रेक्ष्य महाबाहुः कृपणं बह्वभाषत ।। ४२ ।। जब वे आसनपर बैठकर थकावटसे निवृत्त हो चुके अर्थात् विश्राम कर चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उनके पास ही बैठकर उन्हींकी ओर देखते हुए अत्यन्त दीनतापूर्ण वचन बोले— ।। ४२ ।।
अक्षद्यूते च भगवन् धनं राज्यं च मे हृतम् । आहूय निकृतिप्रज्ञैः कितवैरक्षकोविदैः ।। ४३ ।। 'भगवन्! पासे फेंककर खेले जानेवाले जूएके लिये मुझे बुलाकर छल-कपटमें कुशल तथा पासा डालनेकी कलामें निपुण धूर्त जुआरियोंने मेरे सारे धन तथा राज्यका अपहरण