भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 383

कर लिया है ।। ४३ ।। अनक्षज्ञस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चयैः । भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।। ४४ ।। ‘मैं जूएका मर्मज्ञ नहीं हूँ। फिर भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले उन दुष्टोंके द्वारा मेरी प्राणोंसे भी अधिक गौरवशालिनी पत्नी द्रौपदी केश पकड़कर भरी सभामें लायी गयी ।। ४४ ।। पुनर्द्यूतेन मां जित्वा वनवासं सुदारुणम् । प्राव्राजयन् महारण्यमजिनैः परिवारितम् ।। ४५ ।। ‘एक बार जूएके संकटसे बच जानेपर पुनः द्यूतका आयोजन करके उन्होंने मुझे जीत लिया और मृगचर्म पहनाकर वनवासका अत्यन्त दारुण कष्ट भोगनेके लिये इस महान् वनमें निर्वासित कर दिया ।। ४५ ।। अहं वने दुर्वसतीर्वसन् परमदुःखितः । अक्षद्यूताधिकारे च गिरः शृण्वन् सुदारुणाः ।। ४६ ।। आर्तानां सुहृदां वाचो द्यूतप्रभृति शंसताम् । अहं हृदि श्रिताः स्मृत्वा सर्वरात्रीर्विचिन्तयन् ।। ४७ ।। ‘मैं अत्यन्त दुःखी हो बड़ी कठिनाईसे वनमें निवास करता हूँ। जिस सभामें जूआ खेलनेका आयोजन किया गया था, वहाँ प्रतिपक्षी पुरुषोंके मुखसे मुझे अत्यन्त कठोर बातें सुननी पड़ी हैं। इसके सिवा द्यूत आदि कार्योंका उल्लेख करते हुए मेरे दुःखातुर सुहृदोंने जो संतापसूचक बातें कही हैं, वे सब मेरे हृदयमें स्थित हैं। मैं उन सब बातोंको याद करके सारी रात चिन्तामें निमग्न रहता हूँ ।। ४६-४७ ।। यस्मिंश्चैव समस्तानां प्राणा गाण्डीवधन्वनि । विना महात्मना तेन गतसत्त्व इवाभवम् ।। ४८ ।। ‘इधर जिस गाण्डीव धनुषधारी अर्जुनमें हम सबके प्राण बसते हैं, वह भी हमसे अलग है। महात्मा अर्जुनके बिना मैं निष्प्राण-सा हो गया हूँ ।। ४८ ।। कदा द्रक्ष्यामि बीभत्सुं कृतास्त्रं पुनरागतम् । प्रियवादिनमक्षुद्रं दयायुक्तमतन्द्रितः ।। ४९ ।। ‘मैं सदा निरालस्यभावसे यही सोचा करता हूँ कि श्रेष्ठ, दयालु और प्रियवादी अर्जुन कब अस्त्रविद्या सीखकर फिर यहाँ आयेगा और मैं उसे भर आँख देखूँगा ।। ४९ ।। अस्ति राजा मया कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि । भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा क्वचित् । न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीति मे मतिः ।। ५० ।। ‘क्या मेरे-जैसा अत्यन्त भाग्यहीन राजा इस पृथ्वीपर कोई दूसरा भी है? अथवा आपने कहीं मेरे-जैसे किसी राजाको पहले कभी देखा या सुना है। मेरा तो यह विश्वास है कि