महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 394, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपप्रच्छानामयं चापि तयोः सर्वगतं विभुः ॥ १५ ॥ उन दोनोंकी पूजा करके भगवान् इन्द्रने उनसे उन दोनोंके तथा सम्पूर्ण जगत्के कुशल-मंगल एवं स्वस्थताका समाचार पूछा ॥ १५ ॥
नारद उवाच
आवयोः कुशलं देव सर्वत्रगतमीश्वर । लोके च मघवन् कृत्स्ने नृपाः कुशलिनो विभो ॥ १६ ॥ तब नारदजीने कहा—प्रभो! देवेश्वर! हमलोगोंकी सर्वत्र कुशल है और समस्त लोकमें भी राजालोग सकुशल हैं ॥ १६ ॥
बृहदश्व उवाच
नारदस्य वचः श्रुत्वा पप्रच्छ बलवृत्रहा । धर्मज्ञाः पृथिवीपालास्त्यक्तजीवितयोधिनः ॥ १७ ॥ शस्त्रेण निधनं काले ये गच्छन्त्यपराङ्मुखाः । अयं लोकोऽक्षयस्तेषां यथैव मम कामधुक् ॥ १८ ॥ बृहदश्व कहते हैं—राजन्! नारदकी बात सुनकर बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रने उनसे पूछा—‘मुने! जो धर्मज्ञ भूपाल अपने प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते हैं और पीठ न दिखाकर लड़ते समय किसी शस्त्रके आघातसे मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनके लिये हमारा यह स्वर्गलोक अक्षय हो जाता है और मेरी ही तरह उन्हें भी यह मनोवांछित भोग प्रदान करता है ॥ १७-१८ ॥
क्व नु ते क्षत्रियाः शूरा न हि पश्यामि तानहम् । आगच्छतो महीपालान् दयितानतिथीन् मम ॥ १९ ॥ एवमुक्तस्तु शक्रेण नारदः प्रत्यभाषत । ‘वे शूरवीर क्षत्रिय कहाँ हैं? अपने उन प्रिय अतिथियोंको आजकल मैं यहाँ आते नहीं देख रहा हूँ’ इन्द्रके ऐसा पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया ॥ १९ १/२ ॥
नारद उवाच
शृणु मे मघवन् येन न दृश्यन्ते महीक्षितः ॥ २० ॥ विदर्भराज्ञो दुहिता दमयन्तीति विश्रुता । रूपेण समतिक्रान्ता पृथिव्यां सर्वयोषितः ॥ २१ ॥ नारदजी बोले—मघवन्! मैं वह कारण बताता हूँ, जिससे राजालोग आजकल यहाँ नहीं दिखायी देते, सुनिये। विदर्भनरेश भीमके यहाँ दमयन्ती नामसे प्रसिद्ध एक कन्या उत्पन्न हुई है, जो मनोहर रूप-सौन्दर्यमें पृथ्वीकी सम्पूर्ण युवतियोंको लाँघ गयी है ॥ २०-२१ ॥