भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 513

राजन्! नलके ऐसा कहनेपर राजा ऋतुपर्ण चुप हो गये। अब वे एक वनमें एक बहेड़ेके वृक्षके पास आ पहुँचे, जिसमें बहुत-से फल लगे थे ॥ ६ ॥ तं दृष्ट्वा बाहुकं राजा त्वरमाणोऽभ्यभाषत । ममापि सूत पश्य त्वं संख्याने परमं बलम् ॥ ७ ॥ उस वृक्षको देखकर राजा ऋतुपर्णने तुरंत ही बाहुकसे कहा—‘सूत! तुम देखो, मुझमें भी गणना करने (हिसाब लगाने) की कितनी अद्भुत शक्ति है ॥ ७ ॥ सर्वः सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन । नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित् ॥ ८ ॥ ‘सब लोग सभी बातें नहीं जानते। संसारमें कोई भी सर्वज्ञ नहीं है तथा एक ही पुरुषमें सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रतिष्ठा नहीं है ॥ ८ ॥ वृक्षेऽस्मिन् यानि पर्णानि फलान्यपि च बाहुक । पतितान्यपि यान्यत्र तत्रैकमधिकं शतम् ॥ ९ ॥ एकपत्राधिकं चात्र फलमेकं च बाहुक । पञ्चकोट्योऽथ पत्राणां द्वयोरपि च शाखयोः ॥ १० ॥ प्रचिनुह्यस्य शाखे द्वे याश्चाप्यन्याः प्रशाखिकाः । आभ्यां फलसहस्रे द्वे पञ्चोनं शतमेव च ॥ ११ ॥ ‘बाहुक! इस वृक्षपर जितने पत्ते और फल हैं, उन सबको मैं बताता हूँ। पेड़के नीचे जो पत्ते और फल गिरे हुए हैं, उनकी संख्या एक सौ अधिक है, इसके सिवा एक पत्र तथा एक फल और भी अधिक है; अर्थात् नीचे गिरे हुए पत्तों और फलोंकी संख्या वृक्षमें लगे हुए पत्तों और फलोंसे एक सौ दो अधिक है। इस वृक्षकी दोनों शाखाओंमें पाँच करोड़ पत्ते हैं। तुम्हारी इच्छा हो तो इन दोनों शाखाओं तथा इसकी अन्य प्रशाखाओं (को काटकर उन)-के पत्ते गिन लो। इसी प्रकार इन शाखाओंमें दो हजार पंचानबे फल लगे हुए हैं ॥ ततो रथमवस्थाप्य राजानं बाहुकोऽब्रवीत् । परोक्षमिव मे राजन् कत्थसे शत्रुकर्शन ॥ १२ ॥ प्रत्यक्षमेतत् कर्तास्मि शातयित्वा बिभीतकम् । अथात्र गणिते राजन् विद्यते न परोक्षता ॥ १३ ॥ प्रत्यक्षं ते महाराज शातयिष्ये बिभीतकम् । अहं हि नाभिजानामि भवेदेवं न वेति वा ॥ १४ ॥ यह सुनकर बाहुकने रथ खड़ा करके राजासे कहा—‘शत्रुसूदन नरेश! आप जो कह रहे हैं, वह संख्या परोक्ष है। मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर उसके फलोंकी संख्याको प्रत्यक्ष करूँगा। महाराज! आपकी आँखोंके सामने इस बहेड़ेको काटूँगा। इस प्रकार गणना कर लेनेपर वह संख्या परोक्ष नहीं रह जायगी। बिना ऐसा किये मैं तो नहीं समझ सकता कि (फलोंकी) संख्या इतनी है या नहीं ॥ १२—१४ ॥