भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 520

मुझे याद नहीं कि स्वेच्छापूर्वक अर्थात् हँसी-मजाकमें भी मैं कभी झूठ बोली हूँ, स्मरण नहीं कि कभी किसीका मेरेद्वारा अपकार हुआ हो तथा यह भी स्मरण नहीं कि मैंने प्रतिज्ञा की हुई बातका उल्लंघन किया हो ॥ १३ ॥
प्रभुः क्षमावान् वीरश्च दाता चाप्यधिको नृपैः ।
रहोऽनीचानुवर्ती च क्लीबवन्मम नैषधः ॥ १४ ॥
मेरे निषधराज नल शक्तिशाली, क्षमाशील, वीर, दाता, सब राजाओंसे श्रेष्ठ, एकान्तमें भी नीच कर्मसे दूर रहनेवाले तथा परायी स्त्रीके लिये नपुंसकतुल्य हैं ॥
गुणांस्तस्य स्मरन्त्या मे तत्पराया दिवानिशम् ।
हृदयं दीर्यत इदं शोकात् प्रियविनाकृतम् ॥ १५ ॥
मैं (सदा) उन्हींके गुणोंका स्मरण करती और दिन-रात उन्हींके परायण रहती हूँ। प्रियतम नलके बिना मेरा यह हृदय उनके विरहशोकसे विदीर्ण-सा होता रहता है ॥ १५ ॥
एवं विलपमाना सा नष्टसंज्ञेव भारत ।
आरुरोह महद् वेश्म पुण्यश्लोकदिदृक्षया ॥ १६ ॥
भारत! इस प्रकार विलाप करती हुई दमयन्ती अचेत-सी हो गयी। वह पुण्यश्लोक नलके दर्शनकी इच्छासे ऊँचे महलकी छतपर जा चढ़ी ॥ १६ ॥
ततो मध्यमकक्षायां ददर्श रथमास्थितम् ।
ऋतुपर्णं महीपालं सहवार्ष्णेयबाहुकम् ॥ १७ ॥
वहाँसे उसने देखा, वार्ष्णेय और बाहुकके साथ रथपर बैठे हुए महाराज ऋतुपर्ण मध्यम कक्षा (परकोटे)-में पहुँच गये हैं ॥ १७ ॥
ततोऽवतीर्य वार्ष्णेयो बाहुकश्च रथोत्तमात् ।
हयांस्तानवमुच्याथ स्थापयामास वै रथम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर वार्ष्णेय और बाहुकने उस उत्तम रथसे उतरकर घोड़े खोल दिये और रथको एक जगह खड़ा कर दिया ॥ १८ ॥
सोऽवतीर्य रथोपस्थादृतुपर्णो नराधिपः ।
उपतस्थे महाराजं भीमं भीमपराक्रमम् ॥ १९ ॥
इसके बाद राजा ऋतुपर्ण रथके पिछले भागसे उतरकर भयानक पराक्रमी महाराज भीमसे मिले ॥ १९ ॥
तं भीमः प्रतिजग्राह पूजया परया ततः ।
स तेन पूजितो राजा ऋतुपर्णो नराधिपः ॥ २० ॥
तदनन्तर भीमने बड़े आदर-सत्कारके साथ उन्हें अपनाया और राजा ऋतुपर्णका भलीभाँति आदर-सत्कार किया ॥ २० ॥
स तत्र कुण्डिने रम्ये वसमानो महीपतिः ।
न च किंचित् तदापश्यत् प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ।