भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 724, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 724

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एकाधिकशततमोऽध्यायः

वृत्रासुरका वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणा

लोमश उवाच

ततः स वज्री बलिभिर्देवैरभिरक्षितः ।
आससाद ततो वृत्रं स्थितमावृत्य रोदसी ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वज्रधारी इन्द्र बलवान् देवताओंसे सुरक्षित हो वृत्रासुरके पास गये। वह असुर भूलोक और आकाशको घेरकर खड़ा था ॥ १ ॥

कालकेयैर्महाकायैः समन्तादभिरक्षितम् ।
समुद्यतप्रहरणैः सशृङ्गैरिव पर्वतैः ॥ २ ॥
कालकेय नामवाले विशालकाय दैत्य, जो हाथोंमें हथियार लिये होनेके कारण शृंगयुक्त पर्वतोंके समान जान पड़ते थे, चारों ओरसे उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ २ ॥

ततो युद्धं समभवद् देवानां दानवैः सह ।
मुहूर्तं भरतश्रेष्ठ लोकत्रासकरं महत् ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! इन्द्रके आते ही देवताओंका दानवोंके साथ दो घड़ीतक बड़ा भीषण युद्ध हुआ जो तीनों लोकोंको त्रसा करनेवाला था ॥ ३ ॥

उद्यतप्रतिपिष्टानां खड्गानां वीरबाहुभिः ।
आसीत् सुतुमुलः शब्दः शरीरेष्वभिपात्यताम् ॥ ४ ॥
वीरोंकी भुजाओंके साथ उठे हुए खड्ग शत्रुके शरीरोंपर पड़ते और विपक्षी योद्धाओंके घातक प्रहारोंसे टूटकर चूर-चूर हो जाते थे, उस समय उनका अत्यन्त भयंकर शब्द सुन पड़ता था ॥ ४ ॥

शिरोभिः प्रपतद्भिश्चाप्यन्तरिक्षान्महीतलम् ।
तालैरिव महाराज वृन्ताद् भ्रष्टैरदृश्यत ॥ ५ ॥
महाराज! अपने मूल स्थानसे टूटकर गिरे हुए ताल-फलोंके समान आकाशसे गिरते हुए योद्धाओंके मस्तकों-द्वारा वहाँकी भूमि आच्छादित दिखायी देती थी ॥ ५ ॥

ते हेमकवचा भूत्वा कालेयाः परिघायुधाः ।
त्रिदशानभ्यवर्तन्त दावदग्धा इवाद्रयः ॥ ६ ॥
कालकेयोंने सोनेके कवच धारण करके हाथोंमें परिघ लिये देवताओंपर धावा किया। उस समय वे दानव दावानलसे दग्ध हुए पर्वतोंकी भाँति दिखायी देते थे ॥ ६ ॥

तेषां वेगवतां वेगं साभिमानं प्रधावताम् ।
न शेकुस्त्रिदशाः सोढुं ते भग्नाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ७ ॥

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