भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 727

तीनों लोकोंका नाश करनेके लिये बड़े गर्वसे एक साथ मन्त्रणा करने लगे। उनमेंसे कुछ दैत्य जो अपनी बुद्धिके निश्चयको स्पष्टरूपसे जाननेवाले थे; (जगत्के विनाशके लिये) उपयोगी विभिन्न उपायोंका वर्णन करने लगे ॥ १८-१९ ॥

तेषां तु तत्र क्रमकालयोगाद् घोरा मतिश्चिन्तयतां बभूव । ये सन्ति विद्यातपसोपपन्ना- स्तेषां विनाशः प्रथमं तु कार्यः ॥ २० ॥ लोका हि सर्वे तपसा ध्रियन्ते तस्मात् त्वरध्वं तपसः क्षयाय । ये सन्ति केचिच्च वसुंधरायां तपस्विनो धर्मविदश्च तज्ज्ञाः ॥ २१ ॥ तेषां वधः क्रियतां क्षिप्रमेव तेषु प्रणष्टेषु जगत् प्रणष्टम् । एवं हि सर्वे गतबुद्धिभावा जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः ॥ २२ ॥ दुर्गं समाश्रित्य महोर्मिमन्तं रत्नाकरं वरुणस्यालयं स्म ॥ २३ ॥

वहाँ क्रमशः दीर्घकालतक उपायचिन्तनमें लगे हुए उन असुरोंने यह घोर निश्चय किया कि जो लोग विद्वान् और तपस्वी हों, सबसे पहले उन्हींका विनाश करना चाहिये। सम्पूर्ण लोग तपसे ही टिके हुए हैं। अतः तुम सब लोग तपस्याके विनाशके लिये शीघ्रतापूर्वक कार्य करो। भूमण्डलमें जो कोई भी तपस्वी, धर्मज्ञ एवं उन्हें जानने-माननेवाले लोग हों, उन सबका तुरंत वध कर डालो। उनके नष्ट होनेपर सारा जगत् नष्ट हो जायगा। इस प्रकार बुद्धि और विचारसे हीन वे समस्त दैत्य संसारके विनाशकी बात सोचकर अत्यन्त हर्षका अनुभव करने लगे। उत्ताल तरंगोंसे भरे हुए वरुणके निवासस्थान रत्नाकर समुद्ररूप दुर्गका आश्रय लेकर वे उसमें निर्भय होकर रहने लगे ॥ २०—२३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वृत्रवधोपाख्याने एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें वृत्रवधोपाख्यानविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥