महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 925, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु
लोमश उवाच
एषा मधुविला राजन् समङ्गा सम्प्रकाशते ।
एतत् कर्दमिलं नाम भरतस्याभिषेचनम् ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! यह मधुविला नदी प्रकाशित हो रही है। इसीका दूसरा नाम समंगा है और यह कर्दमिल नामक क्षेत्र है, जहाँ राजा भरतका अभिषेक किया गया था ॥ १ ॥
अलक्ष्म्या किल संयुक्तो वृत्रं हत्वा शचीपतिः ।
आप्लुतः सर्वपापेभ्यः समङ्गायां व्यमुच्यत ॥ २ ॥
कहते हैं, वृत्रासुरका वध करके जब शचीपति इन्द्र श्रीहीन हो गये थे, उस समय उस समंगा नदीमें गोता लगाकर ही वे अपने सब पापोंसे छुटकारा पा सके थे ॥ २ ॥
एतद् विनशनं कुक्षौ मैनाकस्य नरर्षभ ।
अदितिर्यत्र पुत्रार्थं तदन्नमपचत् पुरा ॥ ३ ॥
नरश्रेष्ठ! मैनाक पर्वतके कुक्षिभागमें यह विनशन नामक तीर्थ है, जहाँ पूर्वकालमें अदिति देवीने पुत्र-प्राप्तिके लिये साध्य देवताओंके उद्देश्यसे अन्न* तैयार किया था ॥ ३ ॥
एनं पर्वतराजानमारुह्य भरतर्षभाः ।
अयशस्यामसंशब्द्यामलक्ष्मीं व्यपनोत्स्यथ ॥ ४ ॥
भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुषो! इस पर्वतराज हिमालयपर आरूढ़ होकर तुम सब अयश फैलानेवाली और नाम लेनेके अयोग्य अपनी श्रीहीनताको शीघ्र ही दूर भगा दोगे ॥ ४ ॥
एते कनखला राजन्नृषीणां दयिता नगाः ।
एषा प्रकाशते गङ्गा युधिष्ठिर महानदी ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर! ये कनखलकी पर्वत-मालाएँ हैं जो ऋषियोंको बहुत प्रिय लगती हैं। ये महानदी गंगा सुशोभित हो रही हैं ॥ ५ ॥
सनत्कुमारो भगवानत्र सिद्धिमगात् पुरा ।
आजमीढावगाह्यैनां सर्वपापैः प्रमोक्ष्यसे ॥ ६ ॥
यहीं पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने सिद्धि प्राप्त की थी। अजमीढनन्दन! इस गंगामें स्नान करके तुम सब पापोंसे छुटकारा पा जाओगे ॥ ६ ॥