भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 936

आकर उन्होंने देखा कि मेरी पुत्रवधू एवं परावसुकी पत्नी आर्तभावसे रो रही है। युधिष्ठिर! यह देखकर रैभ्यने मधुर वाणीद्वारा उसे सान्त्वना दी तथा रोनेका कारण पूछा। उस शुभलक्षणा बहूने यवक्रीतकी कही हुई सारी बातें श्वशुरके सामने कह सुनायीं एवं स्वयं उसने भलीभाँति सोच-विचारकर यवक्रीतकी बातें माननेसे जो अस्वीकार कर दिया था, वह सारा वृत्तान्त भी बता दिया ।। ६-७ ।। शृण्वानस्यैव रैभ्यस्य यवक्रीत विचेष्टितम् । दहन्निव तदा चेतः क्रोधः समभवन्महान् ॥ ८ ॥ यवक्रीतकी यह कुचेष्टा सुनते ही रैभ्यके हृदयमें क्रोधकी प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित हो उठी, जो उनके अन्तःकरणको मानो भस्म किये दे रही थी ।। ८ ।। स तदा मन्युनाऽऽविष्टस्तपस्वी कोपनो भृशम् । अवलुच्य जटामेकां जुहावाग्नौ सुसंस्कृते ॥ ९ ॥ तपस्वी रैभ्य स्वभावसे ही बड़े क्रोधी थे, तिसपर भी उस समय उनके ऊपर क्रोधका आवेश छा रहा था। अतः उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़कर संस्कारपूर्वक स्थापित की हुई अग्निमें होम दी ।। ९ ।। ततः समभवन्नारी तस्या रूपेण सम्मिता । अवलुच्यापरां चापि जुहावाग्नौ जटां पुनः ॥ १० ॥ उससे एक नारीके रूपमें कृत्या प्रकट हुई, जो रूपमें उनकी पुत्रवधूके ही समान थी। तत्पश्चात् एक-दूसरी जटा उखाड़कर उन्होंने पुनः उसी अग्निमें डाल दी ।। १० ।। ततः समभवद् रक्षो घोराक्षं भीमदर्शनम् । अब्रूतां तौ तदा रैभ्यं किं कार्यं करवावहै ॥ ११ ॥ उससे एक राक्षस प्रकट हुआ, जिसकी आँखें बड़ी डरावनी थीं। वह देखनेमें बड़ा भयानक प्रतीत होता था। उस समय उन दोनोंने रैभ्य मुनिसे पूछा—'हम आपकी किस आज्ञाका पालन करें?' ।। ११ ।। तावब्रवीदृषिः क्रुद्धो यवक्रीर्वध्यतामिति । जग्मतुस्तौ तथेत्युक्त्वा यवक्रीतजिघांसया ॥ १२ ॥ तब क्रोधमें भरे हुए महर्षिने कहा—'यवक्रीतको मार डालो।' उस समय 'बहुत अच्छा' कहकर वे दोनों यवक्रीतके वधकी इच्छासे उसका पीछा करने लगे ।। १२ ।। ततस्तं समुपास्थाय कृत्या सृष्टा महात्मना । कमण्डलुं जहारास्य मोहयित्वेव भारत ॥ १३ ॥ भारत! महामना रैभ्यकी रची हुई कृत्यारूप सुन्दरी नारीने पहले यवक्रीतके पास उपस्थित हो उसे मोहमें डालकर उसका कमण्डलु हर लिया ।। १३ ।। उच्छिष्टं तु यवक्रीतमपकृष्टकमण्डलुम् । तत उद्यतशूलः स राक्षसः समुपाद्रवत् ॥ १४ ॥