भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः

व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना

धृतराष्ट्र उवाच

एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि नो मुने ।
अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपाः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले—महाप्राज्ञ मुने! आप जैसा कहते हैं, यही ठीक है। मैं भी इसे ही ठीक मानता हूँ तथा ये सब राजालोग भी इसीका अनुमोदन करते हैं ॥ १ ॥
भवांश्च मन्यते साधु यत् कुरूणां महोदयम् ।
तदेव विदुरोऽप्याह भीष्मो द्रोणश्च मां मुने ॥ २ ॥
मुने! आप भी वही उत्तम मानते हैं जो कुरुवंशके महान् अभ्युदयका कारण है। मुने! यही बात विदुर, भीष्म और द्रोणाचार्यने भी मुझे कही है ॥ २ ॥
यदि त्वहमनुग्राह्यः कौरव्येषु दया यदि ।
अन्वशाधि दुरात्मानं पुत्रं दुर्योधनं मम ॥ ३ ॥
यदि आपका मुझपर अनुग्रह है और यदि कौरव-कुलपर आपकी दया है तो आप मेरे दुरात्मा पुत्र दुर्योधनको स्वयं ही शिक्षा दीजिये ॥ ३ ॥

व्यास उवाच

अयमायाति वै राजन् मैत्रेयो भगवानृषिः ।
अन्विष्य पाण्डवान् भ्रातृनिहैत्यस्मद्दिदृक्षया ॥ ४ ॥
व्यासजीने कहा—राजन्! ये महर्षि भगवान् मैत्रेय आ रहे हैं। पाँचों पाण्डवबन्धुओंसे मिलकर अब ये हमलोगोंसे मिलनेके लिये यहाँ आते हैं ॥ ४ ॥
एष दुर्योधनं पुत्रं तव राजन् महार्षिः ।
अनुशास्ता यथान्यायं शमायास्य कुलस्य च ॥ ५ ॥
महाराज! ये महर्षि ही इस कुलकी शान्तिके लिये तुम्हारे पुत्र दुर्योधनको यथायोग्य शिक्षा देंगे ॥ ५ ॥
ब्रूयाद् यदेष कौरव्य तत् कार्यमविशङ्कया ।
अक्रियायां तु कार्यस्य पुत्रं ते शप्स्यते रुषा ॥ ६ ॥
कुरुनन्दन! मैत्रेय जो कुछ कहें, उसे निःशंक होकर करना चाहिये। यदि उनके बताये हुए कार्यकी अवहेलना की गयी तो वे कुपित होकर तुम्हारे पुत्रको शाप दे देंगे ॥ ६ ॥