महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1066, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौमदत्तिर्महेष्वासो रथयूथपयूथपः । बलक्षयममित्राणां सुमहान्तं करिष्यति ॥ २९ ॥ सोमदत्तके पुत्र महाधनुर्धर भूरिश्रवा भी अस्त्र-विद्याके पण्डित और तुम्हारे हितैषी सुहृद् हैं। ये रथियोंके यूथपतियोंके भी यूथपति हैं, अतः तुम्हारे शत्रुओंकी सेनाका महान् संहार करेंगे ॥ २८-२९ ॥
सिन्धुराजो महाराज मतो मे द्विगुणो रथः । योत्स्यते समरे राजन् विक्रान्तो रथसत्तमः ॥ ३० ॥ महाराज! सिन्धुराज जयद्रथको मैं दो रथियोंके बराबर समझता हूँ। ये बड़े पराक्रमी तथा रथी योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं। राजन्! ये भी समरांगणमें पाण्डवोंके साथ युद्ध करेंगे ॥ ३० ॥
द्रौपदीहरणे राजन् परिक्लिष्टश्च पाण्डवैः । संस्मरंस्तं परिक्लेशं योत्स्यते परवीरहा ॥ ३१ ॥ नरेश्वर! द्रौपदीहरणके समय पाण्डवोंने इन्हें बहुत कष्ट पहुँचाया था। उस महान् क्लेशको याद करके शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले जयद्रथ अवश्य युद्ध करेंगे ॥ ३१ ॥
एतेन हि तदा राजंस्तप आस्थाय दारुणम् । सुदुर्लभो वरो लब्धः पाण्डवान् योद्धुमाहवे ॥ ३२ ॥ राजन्! उस समय इन्होंने कठोर तपस्या करके युद्धमें पाण्डवोंसे मुठभेड़ कर सकनेका अत्यन्त दुर्लभ वर प्राप्त किया था ॥ ३२ ॥
स एष रथशार्दूलस्तद् वैरं संस्मरन् रणे । योत्स्यते पाण्डवैस्तात प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ॥ ३३ ॥ तात! ये रथियोंमें श्रेष्ठ जयद्रथ युद्धमें उस पुराने वैरको याद करके अपने दुस्त्यज प्राणोंकी भी बाजी लगाकर पाण्डवोंके साथ संग्राम करेंगे ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥