महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1107, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै ॥ ५ ॥ गच्छ भद्रे पुनस्तत्र सकाशं भीष्मकस्य वै । नाहमिच्छामि भीष्मेण गृहीतां त्वां प्रसह्य वै ॥ ६ ॥ ‘भद्रे! तुम पुनः वहाँ भीष्मके ही पास जाओ। भीष्मने तुम्हें बलपूर्वक पकड़ लिया था, अतः अब तुम्हें मैं अपनी पत्नी बनाना नहीं चाहता ॥ ६ ॥ त्वं हि भीष्मेण निर्जित्य नीता प्रीतिमती तदा । परामृश्य महायुद्धे निर्जित्य पृथिवीपतीन् ॥ ७ ॥ ‘भीष्मने उस महायुद्धमें समस्त भूपालोंको हराकर तुम्हें जीता और तुम्हें उठाकर वे अपने साथ ले गये। तुम उस समय उनके साथ प्रसन्न थीं ॥ ७ ॥ नाहं त्वय्यन्यपूर्वायां भार्यार्थी वरवर्णिनि । कथमस्मद्विधो राजा परपूर्वां प्रवेशयेत् ॥ ८ ॥ नारीं विदितविज्ञानः परेषां धर्ममादिशन् । यथेष्टं गम्यतां भद्रे मा त्वां कालोऽत्यगादयम् ॥ ९ ॥ ‘वरवर्णिनि! जो पहले औरकी हो चुकी हो, ऐसी स्त्रीको मैं अपनी पत्नी बनाऊँ, यह मेरी इच्छा नहीं है। जिस नारीपर पहले किसी दूसरे पुरुषका अधिकार हो गया हो, उसे सारी बातोंको ठीक-ठीक जाननेवाला मेरे-जैसा राजा जो दूसरोंको धर्मका उपदेश करता है, कैसे अपने घरमें प्रविष्ट करायेगा। भद्रे! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ। तुम्हारा यह समय यहाँ व्यर्थ न बीते’ ॥ ८-९ ॥ अम्बा तमब्रवीद् राजन्नङ्गशरपीडिता । नैवं वद महीपाल नैतदेवं कथंचन ॥ १० ॥ नास्मि प्रीतिमती नीता भीष्मेणामित्रकर्शन । बलान्नीतास्मि रुदती विद्राव्य पृथिवीपतीन् ॥ ११ ॥ राजन्! यह सुनकर कामदेवके बाणोंसे पीड़ित हुई अम्बा शाल्वराजसे बोली—‘भूपाल! तुम किसी तरह भी ऐसी बात मुँहसे न निकालो। शत्रुसूदन! मैं भीष्मके साथ प्रसन्नतापूर्वक नहीं गयी थी। उन्होंने समस्त राजाओंको खदेड़कर बलपूर्वक मेरा अपहरण किया था और मैं रोती हुई ही उनके साथ गयी थी ॥ १०-११ ॥ भजस्व मां शाल्वपते भक्तां बालामनागसम् । भक्तानां हि परित्यागो न धर्मेषु प्रशस्यते ॥ १२ ॥ ‘शाल्वराज! मैं निरपराध अबला हूँ। तुम्हारे प्रति अनुरक्त हूँ। मुझे स्वीकार करो; क्योंकि भक्तोंका परित्याग किसी भी धर्ममें अच्छा नहीं बताया गया है ॥ १२ ॥ साहमामन्त्र्य गाङ्गेयं समरेष्वनिवर्तिनम् । अनुज्ञाता च तेनैव ततोऽहं भृशमागता ॥ १३ ॥