महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1111, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसने पुण्यशील तपस्वी महात्माओंके आश्रमपर जाकर वहीं वह रात बितायी। उस आश्रममें तपस्वी-लोगोंने सब ओरसे घेरकर उसकी रक्षा की थी॥ ३६॥
आचख्यौ च यथावृत्तं सर्वमात्मनि भारत।
विस्तरेण महाबाहो निखिलेन शुचिस्मिता।
हरणं च विसर्गं च शाल्वेन च विसर्जनम्॥ ३७॥
महाबाहु भरतनन्दन! पवित्र मुसकानवाली अम्बाने अपने ऊपर बीता हुआ सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक उन महात्माओंसे बताया। किस प्रकार उसका अपहरण हुआ? कैसे भीष्मसे छुटकारा मिला? और फिर किस प्रकार शाल्वने उसे त्याग दिया, ये सारी बातें उसने कह सुनायीं॥ ३७॥
ततस्तत्र महानासीद् ब्राह्मणः संशितव्रतः।
शैखावत्यस्तपोवृद्धः शास्त्रे चारण्यके गुरुः॥ ३८॥
उस आश्रममें कठोर व्रतका पालन करनेवाले शैखावत्य नामसे प्रसिद्ध एक तपोवृद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शास्त्र और आरण्यक आदिकी शिक्षा देनेवाले सद्गुरु थे॥ ३८॥
आर्तां तामाह स मुनिः शैखावत्यो महातपाः।
निःश्वसन्तीं सतीं बालां दुःखशोकपरायणाम्॥ ३९॥
महातपस्वी शैखावत्य मुनिने वहाँ सिसकती हुई उस दुःखशोकपरायणा सती साध्वी आर्त अबलासे कहा—॥ ३९॥
एवं गते तु किं भद्रे शक्यं कर्तुं तपस्विभिः।
आश्रमस्थैर्महाभागे तपोयुक्तैर्महात्मभिः॥ ४०॥
‘भद्रे! महाभागे! ऐसी दशामें इस आश्रममें निवास करनेवाले तपःपरायण तपोधन महात्मा तुम्हारा क्या सहयोग कर सकते हैं?’॥ ४०॥
सा त्वेनमब्रवीद् राजन् क्रियतां मदनुग्रहः।
प्राव्राज्यमहमिच्छामि तपस्तप्स्यामि दुष्करम्॥ ४१॥
राजन्! तब अम्बाने उनसे कहा—‘भगवन्! मुझपर अनुग्रह कीजिये। मैं संन्यासियोंका-सा धर्म पालन करना चाहती हूँ। यहाँ रहकर दुष्कर तपस्या करूँगी॥ ४१॥
मयैव यानि कर्माणि पूर्वदेहे तु मूढया।
कृतानि नूनं पापानि तेषामेतत् फलं ध्रुवम्॥ ४२॥
‘मुझ मूढ़ नारीने अपने पूर्वजन्मके शरीरसे जो पापकर्म किये थे, अवश्य ही उन्हींका यह दुःखदायक फल प्राप्त हुआ है॥ ४२॥
नोत्सहे तु पुनर्गन्तुं स्वजनं प्रति तापसाः।
प्रत्याख्याता निरानन्दा शाल्वेन च निराकृता॥ ४३॥
‘तपस्वी महात्माओ! अब मैं अपने स्वजनोंके यहाँ फिर नहीं लौट सकती; क्योंकि राजा शाल्वने मुझे कोरा उत्तर देकर त्याग दिया है, उससे मेरा सारा जीवन आनन्दशून्य