महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1119, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकस्य चेयं तव च का भवतीच्छामि वेदितुम् ॥ ४३ ॥ राजर्षे! मैं यह जानना चाहता हूँ कि यह कन्या किसलिये वनमें आयी है? यह किसकी पुत्री है और आपकी क्या लगती है? ॥ ४३ ॥
होत्रवाहन उवाच
दौहित्रीयं मम विभो काशिराजसुता प्रिया । ज्येष्ठा स्वयंवरे तस्थौ भगिनीभ्यां सहानघ ॥ ४४ ॥ इयमम्बेति विख्याता ज्येष्ठा काशिपतेः सुता । अम्बिकाम्बालिके कन्ये कनीयस्यौ तपोधन ॥ ४५ ॥ होत्रवाहन बोले—प्रभो! यह मेरी दौहित्री (पुत्रीकी पुत्री) है। अनघ! काशिराजकी परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्री अपनी दो छोटी बहिनोंके साथ स्वयंवरमें उपस्थित हुई थी। उनमेंसे यही अम्बा नामसे विख्यात काशिराजकी ज्येष्ठ पुत्री है। तपोधन! इसकी दोनों छोटी बहिनें अम्बिका और अम्बालिका कहलाती हैं ॥ ४४-४५ ॥
समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां ततोऽभवत् । कन्यानिमित्तं विप्रर्षे तत्रासीदुत्सवो महान् ॥ ४६ ॥ ब्रह्मर्षे! काशीपुरीमें इन्हीं कन्याओंके लिये भूमण्डलका समस्त क्षत्रियसमुदाय एकत्र हुआ था। उस अवसरपर वहाँ महान् स्वयंवरोत्सवका आयोजन किया गया था ॥ ४६ ॥
ततः किल महावीर्यो भीष्मः शान्तनवो नृपान् । अधिक्षिप्य महातेजास्तिस्रः कन्या जहार ताः ॥ ४७ ॥ कहते हैं उस अवसरपर महातेजस्वी और महा-पराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म सब राजाओंको जीतकर इन तीनों कन्याओंको हर लाये ॥ ४७ ॥
निर्जित्य पृथिवीपालानथ भीष्मो गजाह्वयम् । आजगाम विशुद्धात्मा कन्याभिः सह भारतः ॥ ४८ ॥ भरतनन्दन भीष्मका हृदय इन कन्याओंके प्रति सर्वथा शुद्ध था। वे समस्त भूपालोंको परास्त करके कन्याओंको साथ लिये हस्तिनापुरमें आये ॥ ४८ ॥
सत्यवत्यै निवेद्याथ विवाहं समनन्तरम् । भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य समाज्ञापयत प्रभुः ॥ ४९ ॥ वहाँ आकर शक्तिशाली भीष्मने सत्यवतीको ये कन्याएँ सौंप दीं और इनके साथ अपने छोटे भाई विचित्रवीर्यका विवाह करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ४९ ॥
तं तु वैवाहिकं दृष्ट्वा कन्येयं समुपार्जितम् । अब्रवीत् तत्र गाङ्गेयं मन्त्रिमध्ये द्विजर्षभ ॥ ५० ॥ द्विजश्रेष्ठ! वहाँ वैवाहिक आयोजन आरम्भ हुआ देख यह कन्या मन्त्रियोंके बीचमें गंगानन्दन भीष्मसे बोली— ॥ ५० ॥