भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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नवमोऽध्यायः

भारतवर्षकी नदियों, देशों तथा जनपदोंके नाम और

भूमिका महत्त्व

धृतराष्ट्र उवाच

यदिदं भारतं वर्षं यत्रेदं मूर्च्छितं बलम् ।

यत्रातिमात्रलुब्धोऽयं पुत्रो दुर्योधनो मम ॥ १ ॥

यत्र गृद्धाः पाण्डुपुत्रा यत्र मे सज्जते मनः ।

एतन्मे तत्त्वमाचक्ष्व त्वं हि मे बुद्धिमान् मतः ॥ २ ॥

धृतराष्ट्र बोले—संजय! यह जो भारतवर्ष है, जिसमें यह राजाओंकी विशाल वाहिनी

युद्धके लिये एकत्र हुई है, जहाँका साम्राज्य प्राप्त करनेके लिये मेरा पुत्र दुर्योधन ललचाया

हुआ है, जिसे पानेके लिये पाण्डवोंके मनमें भी बड़ी इच्छा है तथा जिसके प्रति मेरा मन भी

बहुत आसक्त है, उस भारतवर्षका तुम यथार्थरूपसे वर्णन करो; क्योंकि इस कार्यके लिये

मेरी दृष्टिमें तुम्हीं सबसे अधिक बुद्धिमान् हो ।। १-२ ।।

संजय उवाच

न तत्र पाण्डवा गृद्धाः शृणु राजन् वचो मम ।

गृद्धो दुर्योधनस्तत्र शकुनिश्चापि सौबलः ॥ ३ ॥

संजयने कहा—राजन्! आप मेरी बात सुनिये। पाण्डवोंको इस भारतवर्षके

साम्राज्यका लोभ नहीं है। दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि ही उसके लिये बहुत लुभाये हुए

हैं ।। ३ ।।

अपरे क्षत्रियाश्चैव नानाजनपदेश्वराः ।

ये गृद्धा भारते वर्षे न मृष्यन्ति परस्परम् ॥ ४ ॥

विभिन्न जनपदोंके स्वामी जो दूसरे-दूसरे क्षत्रिय हैं, वे भी इस भारतवर्षके प्रति गृध्र-

दृष्टि लगाये हुए एक-दूसरेके उत्कर्षको सहन नहीं कर पाते हैं ।। ४ ।।

अत्र ते कीर्तयिष्यामि वर्षं भारत भारतम् ।

प्रियमिन्द्रस्य देवस्य मनोर्वैवस्वतस्य च ॥ ५ ॥

भारत! अब मैं यहाँ आपसे उस भारतवर्षका वर्णन करूँगा, जो इन्द्रदेव और वैवस्वत

मनुका प्रिय देश है ।। ५ ।।

पृथोस्तु राजन् वैन्यस्य तथेश्वाकोर्महात्मनः ।

ययातेरम्बरीषस्य मान्धातुर्नहुषस्य च ॥ ६ ॥

तथैव मुचुकुन्दस्य शिबेरौशीनरस्य च ।