भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1959

महोदधिमिवापूर्णमापगाभिः समन्ततः । अपक्षैः पक्षिसंकाशै रथैर्नागैश्च संवृतम् ॥ १४ ॥ हमारी यह सेना महासागरके समान सब ओरसे परिपूर्ण है। इसमें बिना पंखके ही पक्षियोंके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले रथ और हाथी इस प्रकार आकर मिलते हैं, जैसे समुद्रमें सब ओरसे नदियाँ आकर गिरती हैं ॥ १४ ॥ नानायोधजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गितम् । क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्राससमाकुलम् ॥ १५ ॥ नाना प्रकारके योद्धा ही इस सैन्यसागरके जल हैं, वाहन ही उसमें उठती हुई छोटी-बड़ी तरंगें हैं। इसमें क्षेपणी, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और प्रास आदि अस्त्र-शस्त्र जल-जन्तुओंके समान भरे पड़े हैं ॥ १५ ॥ ध्वजभूषणसम्बाधं रत्नपट्टसुसंचितम् । परिधावद्भिरश्वैश्च वायुवेगविकम्पितम् ॥ १६ ॥ अपारमिव गर्जन्तं सागरप्रतिमं महत् । ध्वज और आभूषणोंसे भरी हुई यह सेना रत्नजटित पताकाओंसे व्याप्त है। दौड़ते हुए घोड़ोंसे जो इस सेनाका चंचल होना है, वही वायुवेगसे इस समुद्रका कम्पन है। सागरसदृश यह विशाल सेना देखनेमें अपार है और निरन्तर गर्जन करती रहती है ॥ १६ १/२ ॥ द्रोणभीष्माभिसंगुप्तं गुप्तं च कृतवर्मणा ॥ १७ ॥ कृपदुःशासनाभ्यां च जयद्रथमुखैस्तथा । भगदत्तविकर्णाभ्यां द्रौणिसौबलबाह्लिकैः ॥ १८ ॥ गुप्तं प्रवीरैर्लोकैश्च सारवद्भिर्महात्मभिः । यदहन्यत संग्रामे दैवमत्र पुरातनम् ॥ १९ ॥ द्रोणाचार्य, भीष्म, कृतवर्मा, कृपाचार्य, दुःशासन, जयद्रथ, भगदत्त, विकर्ण, अश्वत्थामा, शकुनि तथा बाह्लिक आदि प्रमुख वीरों तथा अन्य शक्तिशाली महामनस्वी लोगोंद्वारा मेरी सेना सदा सुरक्षित रहती है। ऐसी सेना भी यदि संग्राममें मारी गयी तो इसमें हमलोगोंका पुरातन प्रारब्ध ही कारण है ॥ १७—१९ ॥ नैतादृशं समुद्योगं दृष्टवन्तो हि मानुषाः । ऋषयो वा महाभागाः पुराणा भुवि संजय ॥ २० ॥ संजय! इस भूतलपर इतनी बड़ी सेनाका जमाव मनुष्योंने कभी नहीं देखा होगा अथवा प्राचीन महाभाग ऋषियोंने भी नहीं देखा होगा ॥ २० ॥ ईदृशोऽपि बलौघस्तु संयुक्तः शस्त्रसम्पदा । वध्यते यत्र संग्रामे किमन्यद् भागधेयतः ॥ २१ ॥ इतना बड़ा सैन्यसमुदाय शस्त्रसम्पत्तिसे संयुक्त होनेपर भी यदि संग्राममें विनष्ट हो रहा है, तो इसमें भाग्यके सिवा और क्या कारण हो सकता है? ॥ २१ ॥