महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2102, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदिच्छामि महाभाग त्वत्प्रसादात् परंतप ॥ ७ ॥ राक्षसापसदं हन्तुं स्वयमेव पितामह । त्वां समाश्रित्य दुर्धर्षं तन्मे कर्तुं त्वमर्हसि ॥ ८ ॥ ‘महाभाग! जैसे आग सूखे पेड़को जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार यह अपमान मेरे अंग-अंगको दग्ध कर रहा है। शत्रुओंको संताप देनेवाले पितामह! मैं आपकी कृपासे स्वयं ही उस नीच एवं दुर्धर्ष राक्षसको मारना चाहता हूँ। आपका सहारा लेकर उसपर विजयी होना चाहता हूँ। अतः आप मेरे इस मनोरथको पूर्ण करें’ ॥ ७-८ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राज्ञो भरतसत्तम । दुर्योधनमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्योधनका यह वचन सुनकर शान्तनुनन्दन भीष्मने उससे इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥
शृणु राजन् मम वचो यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव । यथा त्वया महाराज वर्तितव्यं परंतप ॥ १० ॥ ‘राजन्! कुरुनन्दन! मैं तुमसे जो कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! तुम्हें जिस प्रकार बर्ताव करना चाहिये, वह सुनो ॥ १० ॥’
आत्मा रक्ष्यो रणे तात सर्वावस्थास्वरिंदम । धर्मराजेन संग्रामस्त्वया कार्यः सदानघ ॥ ११ ॥ ‘तात! शत्रुदमन! तुम युद्धमें सदा अपनी रक्षा करो। अनघ! तुम्हें सदा धर्मराज युधिष्ठिरसे ही संग्राम करना चाहिये ॥ ११ ॥
अर्जुनेन यमाभ्यां वा भीमसेनेन वा पुनः । राजधर्मं पुरस्कृत्य राजा राजानमार्छति ॥ १२ ॥ ‘अर्जुन, नकुल, सहदेव अथवा भीमसेनके साथ भी तुम युद्ध कर सकते हो। राजधर्मको सामने रखकर यह बात कही गयी है। राजा राजासे ही युद्ध करता है ॥ १२ ॥
(न तु कार्यस्त्वया राजन् हैडिम्बेन दुरात्मना ॥) अहं द्रोणः कृपो द्रौणिः कृतवर्मा च सात्वतः । शल्यश्च सौमदत्तिश्च विकर्णश्च महारथः ॥ १३ ॥ तव च भ्रातर श्रेष्ठा दुःशासनपुरोगमाः । त्वदर्थे प्रतियोत्स्यामो राक्षसं तं महाबलम् ॥ १४ ॥ ‘राजन्! तुम्हें दुरात्मा घटोत्कचके साथ कदापि युद्ध नहीं करना चाहिये। मैं, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, सात्वतवंशी कृतवर्मा, शल्य, भूरिश्रवा, महारथी विकर्ण तथा दुःशासन आदि तुम्हारे अच्छे भ्राता—ये सब लोग तुम्हारे लिये उस महाबली राक्षससे युद्ध करेंगे ॥ १३-१४ ॥
रौद्रे तस्मिन् राक्षसेन्द्रे यदि तेऽनुशयो महान् ।